Wednesday, 18 January 2017

Madhyamaheshwar Yatra-Part 3 : Madhyamaheshwar,Burha Madhyamaheshwar and Chaukhamba

मद्महेश्वर(मध्यमेश्वर) यात्रा: पार्ट 3 :   

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पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा की हम दोपहर के लगभग दो बजे मद्महेश्वर पहुँच गए थे । मंदिर से पहले रुकने ,खाने-पीने के लिए 4-5 दुकाने हैं। मंदिर के आस पास काफी खुला मैदान है । आज अच्छी धुप निकली हुई थी इसलिए कुछ देर तो सबने आराम किया । उस समय मंदिर के कपाट बंद थे। इतने में मंदिर के पुजारी भी अपने कमरे से बाहर आ गए और बोले यदि आपको अभी वापिस जाना हो तो मंदिर खुलवा देते हैं आप दर्शन कर लो । हमने उन्हें बताया की पहले हम बूढ़ा मद्महेश्वर जायेंगे वहाँ से आने के बाद मंदिर में दर्शन करेंगे । इसी बीच कृष्ण आर्य जी बड़ी हिम्मत वाले निकले और बर्फ़ीले पानी से नहाने लग गए, उन्हें लगा की हम पहले यहाँ दर्शन करेंगे । पानी बहुत ठंडा था , हाथ धोने मात्र से ही सुन्न हो रहे थे लेकिन आर्य जी बाल्टी भर पानी से नहा लिए । नहाने के बाद उन्होंने सिर्फ़ धोती कुरता पहना जिससे उन्हें ठण्ड लग  गयी और उन्होंने कहा की वो अब ऊपर बूढ़ा मद्महेश्वर नहीं जायेंगे बल्कि नीचे मंदिर के पास पुजारी जी के साथ ही रुकेंगे ।




थोड़ी देर आराम करने और एक एक कप चाप पीने के बाद हम पाँच लोग लगभग तीन बजे बूढ़ा मद्महेश्वर की ओर चल दिए। मद्महेश्वर से बूढ़ा मद्महेश्वर की दुरी लगभग ढेड़ किलोमीटर है लेकिन चढाई जबरदस्त है । कोई ढ़ंग का रास्ता भी नहीं बना हुआ बस आपको पहाड़ पर सीधा चढ़ना है । जहाँ मद्महेश्वर समुंदर तल से 3256 मीटर की ऊंचाई पर है वहीँ बूढ़ा मद्महेश्वर 3497 मीटर पर ( दोनों ऊंचाई अपने फ़ोन पर GPS से नापी हैं ) यानि मात्र ढेड़ किलोमीटर में 240 मीटर ऊंचाई । यक़ीनन काफी तीखी है ।

डाक्टर साहेब काफी अस्वस्थ लग रहे थे इसलिए धीरे- धीरे चढ़ पा रहे थे । आज सुबह 6 बजे जब हम चले थे तो 1650 मीटर की ऊंचाई पर थे और पिछले आठ घंटे में 1600 मीटर ऊपर चढ़ 3250 मीटर पर आ चुके थे । इतने कम समय में एक साथ इतना ऊपर आने से बहुत बार शरीर एडजस्ट नहीं कर पाता जिससे तबियत खराब हो जाती है । डाक्टरी भाषा में इसे AMS  कहते हैं यानि - acute mountain sickness । शायद डाक्टर साहेब को इसी कारण दिक्कत हो रही थी। एकलव्य भाई उनके साथ ही थे । डाक्टर साहेब तबियत ख़राब होने और थकावट के बावजूद – चौखम्बा के सुन्दर दृश्यों के लोभ में – उठते बैठते ऊपर की ओर बढ़े चले जा रहे थे ।

कौशिक जी ,मैं और अनिल तीनो -एकलव्य और त्यागी जी से काफी आगे निकल चुके थे । जैसे जैसे हम ऊपर पहुँच रहे थे चौखम्बा की विशाल चोटियाँ थोड़ी थोड़ी दिखनी शुरू हो गयी थी। उनकी सुंदरता ही हमें ऊपर जाने को प्रेरित कर रही थी क्योंकि बूढ़ा मद्महेश्वर से चौखम्बा बेहद खूबसूरत दिखायी देता है । कौशिक जी ,मैं और अनिल लगभग चार बजे बूढ़ा मद्महेश्वर पहुँच गए। चढाई समाप्त होते ही ऊपर एक बड़े से मैदान में एक छोटा सा मंदिर बना हुआ है । बताते हैं कि यहां पर किसी भक्त को शिव जी ने अपने वृद्ध रूप में दर्शन दिये थे इसीलिए इसे बूढ़ा मद्महेश्वर कहते हैं ।

ऊपर , हमारे दायीं तरफ सामने विशाल चौखम्बा सीना ताने खड़ा था उसके बायीं तरफ मंदानी चोटियाँ भी । बड़ा ही खूबसूरत दृश्य था । यहां से विराट चौखम्भा इतना खूबसूरत लगता है कि उससे नज़र ही नहीं हटती । खूबसूरत और विशाल चोटियाँ इंसान को उसकी लघुता का अहसास करवाती हैं -कितने ही किलोमीटर और लगातार कितने घंटे की यात्रा के बाद ही खूबसूरत चोटियाँ आपसे इतनी पास दिखकर भी कितनी दूर होती हैं।

मंदिर के पास ही एक छोटी सी झील है । आप उसे झील कहो या तालाब या कुछ और। ये  काफी छोटी है उसके पास उससे से भी छोटी एक और है लेकिन इनमे चौखम्बा का प्रतिबिम्ब शानदार नज़र आता है बशर्ते आसमान साफ हो । जब हम वहाँ पहुंचे तो चौखम्बा पर एक छोटी सी बदली मंडरा रही थी । उसके हटने का इंतजार किया और यहाँ वहाँ काफी देर तक फ़ोटो लेते रहे । इतने में त्यागी जी और एकलव्य भी ऊपर पहुँच गए तब तक हम वापसी के लिए तैयार थे । दिन ढलने को था और ऊपर काफ़ी ठंडी हवा चल रही थी इसलिए ठण्ड भी लगने लगी थी । अनिल तो तेजी से नीचे की और उतर गया जबकि मैं और कौशिक जी रुक गए । हम साथियों के चलने का इंतजार करने लगे और थोड़ी देर में सभी वापिस चल पड़े । अब तक शाम के पाँच बज चुके थे। मैं भी अनिल की पीछे तेजी से चला और दिन ढलने से पहले रोशनी में ही नीचे पहुँच गया लेकिन बाकि साथियों को आते आते अँधेरा हो गया । उनके आने से पहले मैं और अनिल एक एक कप चाय पी चुके थे. वापसी तक त्यागी जी बुरी तरह थक चुके थे और काफ़ी अस्वस्थ लग रहे थे ।

इस समय तक मंदिर में आरती की पूरी तैयारी हो चुकी थी । आर्य जी अभी तक पंडित जी के साथ उनके कमरे में ही थे और वो लोग हमारे साथियों के आने का इंतजार कर रहे थे। जैसे ही सभी लोग वहाँ पहुंचे मंदिर के कपाट खोल आरती की विधिवत शुरआत की गयी । मंदिर के गर्भ गृह में गिने चुने लोग ही थे । हमारे अलावा 8-10 लोग और वहाँ पहुँच चुके थे , लगभग 20 मिनट आरती में लगे । आरती के बाद मंदिर की परिक्रमा की गयी और प्रशाद वितरण के बाद मंदिर के कपाट फिर से बंद कर दिए गए । यहाँ पर लाइट की व्यवस्था सिर्फ सोलर ऊर्जा से ही है इसलिए सिर्फ़ आरती के समय ही मंदिर में लाइट जलाई गयी थी ।

मंदिर के कपाट बंद होने के बाद हमने इकठ्ठे (मैंने ,एकलव्य और कौशिक जी ने ) मंदिर के सामने खड़े होकर स्वामी तुलसी दास द्वारा रचित श्री रुद्राष्टकम् का ताल से ताल मिलाते हुए उच्च ध्वनि में पाठ किया । ये भी एक नया अनुभव ही था ।  

अब मद्महेश्वर के बारे में कुछ जानकारी  और बाकि यात्रा वृतांत अगली पोस्ट में ।

मद्महेश्वर की कथा :

उत्तराखण्ड में पांच केदार हैं, जो पंच-केदार के नाम से विश्वविख्यात हैं। ये क्रमानुसार इस तरह हैं –केदारनाथ, मद्महेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ और कल्पेश्वर । ऐसा माना जाता है की इन मंदिरो का निर्माण  पाण्डवों द्वारा भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए किया गया था, जो कुरुक्षेत्र में हुए नरसंहार के कारण पाण्डवों से रुष्ट थे। शिव पुराण के अनुसार महाभारत युद्ध के पश्चात पाण्डव जब स्व-गौत्र हत्या के पाप से मुक्त होना चाहते थे तो महर्षि वेद व्यास ने उन्हें तप करके शिवजी को प्रसन्न करने को कहा कि वो ही उनको इस पाप से मुक्ति दिलवा सकते हैं। पाण्डव शिवजी को खोजते हुए यहाँ तक आ पहुंचे, लेकिन शिवजी पाण्डवों से रुष्ट होने के कारण उन्हें दर्शन नहीं देना चाहते थे।

 गुप्तकाशी के जंगलों में  शिवजी ने महिष (बैल) का रूप धारण कर लिया और बाकी जानवरों के साथ चरने लगे। लेकिन पाण्डवों ने शिवजी को पहचान लिया। उनसे बचने के लिए महिष रूपी शिवजी केदार पर्वत की ओर चल दिए और  धरती में अंतर्ध्यान होने लगे लेकिन महाबली भीम ने शिवजी को पीछे से पकड़ लिया लेकिन तब तक महिष का अगला भाग नेपाल के पशुपतिनाथ, मुख रुद्रनाथ, भुजाएं तुंगनाथ, जटाएं कल्पनाथ, नाभि मदमहेश्वर और पृष्ट भाग केदारनाथ में ही रुक गया। शिवजी ने पाण्डवों से प्रसन्न होकर उनको स्व-गोत्र हत्या के पाप से मुक्त कर दिया । बाद में इन सभी स्थानों पर पांडवों ने मंदिर बनवाये ।

पंच केदारो में सबसे पहले केदारनाथ में जहाँ भगवान के पुष्ट भाग की पूजा की जाती है, वहीं  द्वितीय केदार मध्महेश्वर में भगवान  के मध्य भाग यानि नाभि की पूजा की जाती है ।  तृतीय केदार तुंगनाथ में भगवान की भुजाओं और उदर की पूजा की जाती है जबकि चतुर्थ केदार यानि रुद्रनाथ में भगवान के मुख की पूजा की जाती है। पंचम केदार कल्पेश्वर में शिव की जटाओं की पूजा की जाती हैं ।



मद्महेश्वर मंदिर

मंदिर के साथ वाली नीली छत पुजारी का निवास उससे अगली नीली छत वाला दो मंजिला भवन यात्रियों के लिए धर्मशाला 
चौखम्बा के दर्शन 
चौखम्बा के दर्शन 

एक शिखर को ज़ूम करने पर 

यहीं से काछनी ताल का रास्ता जाता है 

चौखम्बा का एक और व्यू 

चौखम्बा ज़ूम करके 

चौखम्बा ज़ूम करके 

चौखम्बा ज़ूम करके 

मंदानी चोटियाँ

मंदानी चोटियाँ

बूढ़ा मद्महेश्वर ,अनिल दीक्षित और चौखम्बा 
बूढ़ा मद्महेश्वर ,संजय कौशिक  और चौखम्बा 

मेरी भी एक फोटो यहाँ बनती है 

सर्दी में गर्मी का अहसास - अन्दर की बात 

बूढ़ा मद्महेश्वर



चौखम्बा और उसका प्रतिबिम्ब 
ऊपर वाले चित्र से इसमें क्या भिन्न है ?


एकलव्य भाई 

पैनोरमा 

41 comments:

  1. Bhagambhag yatra padne mei maza aa raha hai , agli post ki intzar mei

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    1. धन्यवाद महेश जी . भागम-भाग रुकने वाली है .:)

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    2. रुकने नहीं पूरी होने वाली है सहगल साहब ।

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    3. मतलब अगली पोस्ट में रात्रि विश्राम में भागम-भाग रुकने वाली है.

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  2. सहगल साहब ये आरती और यात्रा इस जन्म के लिए बड़े वाला रिचार्ज है । उस आरती का एक एक पल अविस्मरणीय है । वो भावविह्वल पल एक बार आपने पुनः जीवन्त कर दिए । भोले और उनके भक्तों को कोटि कोटि नमन । as usual शानदार फोटो

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    1. उत्साहवर्धन के लिए कौशिक जी धन्यवाद , सही में कई मान्यों में यात्रा यादगार रही .

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  3. शानदार यात्रा! महेश का नाम ही हिमालय की नस नस में समाया हुआ है सारा वातावरण शंकरमयी हो गया होगा ।और चौखम्भा का प्रतिबिंब ऐसा लग रहा है मानो कटोरे में वर्फ रखी हो , शानदार तस्वीरे 👍 एक्लव्य का पिछड़ा दिख रहा है शक्ल ही दिखा देते 😀😁😂

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    1. उत्साहवर्धन के लिए बुआ जी धन्यवाद ।

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    1. धन्यवाद बीनू भाई ।

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  5. Marvelous post. Rudrakshtm in one tuning , �������� & Chokhambha pictures are mind blowing.Keep it up.

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    1. Thanks for your support and continuous encouragement.

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  6. very nice pics....jaha ek aur Tyagi ji thake hue wahi Anil bournvita boy.....tyagi ji ko aram karna chahiye ab thakaan mit jayegi.....badhiya varnan aur foto me choukhamba mast lag raha hai....encouraging journey

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    1. Thanks Mr. Pratik Gandhi for coimg to blog and commenting.

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  7. गजब सहगल साहब सुंदर रचना और फ़ोटो तो कमाल के है

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    1. धन्यवाद विनोद भाई .

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  8. गजब सहगल साहब सुंदर रचना और फ़ोटो तो कमाल के है

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  9. शानदार और भागमभाग यात्रा ... मजा आ गया पढकर ...

    चित्र बड़े शानदार लगे.. खासकर चौखम्बा पर्वत के |

    जय मद्यमहेश्वर की ...

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    1. धन्यवाद रितेश जी ।

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  10. रितेश जी धन्यवाद। चौखम्बा पर्वत है ही खूबसूरत । चित्र तो अच्छे आएंगे ही ।

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  11. Nice post naresh ji. All photos are awesome.

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  12. हर हर महादेव

    सहगल साहब आपके साथ जाने का एक फायदा ये भी है कि आप यादों को ब्लॉग पर संजो लेते हो।

    दोबारा कब ले जाओगे।

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    1. धन्यवाद अनिल जी ।इस बार अमरनाथ चलो ।

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  13. Nice post. Beautiful pictures.

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  14. ओम सैनीJanuary 20, 2017 10:59 am

    बेहद खूबसूरत जगह का शानदार वर्णन किया आपने सहगल साब। फोटो भी शानदार है। बहुत बढ़िया ।

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    1. धन्यवाद ओम जी ।।

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  15. बहुत ही अच्छा वर्णन।
    बड़ी ही खूबसूरत,लुभावनी फ़ोटो है।

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    1. धन्यवाद सुमित जी ।💐

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  16. Aapki post padh ke is yatra ko miss kar raha hun. Excellent

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  17. very detailed log and beautiful fotos

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  18. Its very nice yatra towards the holy kedar of lord shiva ,the reflection of mighty chaukhambha peak in lake is awesome .chaukhmbha looks so close that we can touch it from here ...........but yet so far..thanks for uploading all these lovely snpas of yatra and my lovely himalayas peaks .

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    1. Thanks Shyam bhai for reading and liking.

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  19. बताते हैं कि यहां पर किसी भक्त को शिव जी ने अपने वृद्ध रूप में दर्शन दिये थे इसीलिए इसे बूढ़ा मद्महेश्वर कहते हैं ।बढ़िया जानकारी लिखी है सहगल साब ! चित्र वाकई शानदार हैं और वृतांत सम्पूर्ण जानकारी से भरा ! काछनी ताल का रास्ता भयंकर लग रहा है , उम्मीद है इस जून में हम भी पहुँच जाएँ !! चलते रहिये

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    1. धन्यवाद योगी भाई । काछनी ताल की आपकी यात्रा की इच्छा अवश्य पूरी होगी ।

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  20. बढ़िया पोस्ट ...👍, खूबसूरत चित्रों और संपूर्ण घटनाक्रम को समेटे हुए।
    हाँ बूढ़ा मधेश तक पहुँचने में बहुत ज्यादा थक गया था और आप सबके रात में ही वापसी के प्रोग्राम को मैं अंजाम दे पाउँगा इसमें मुझे खुद संशय हो रहा था ऊपर से एकलव्य ने भी बार बार यही कहा के डॉ. साहब अब वापसी की हिम्मत नही है तो जो थोड़ा ऊर्जा बची भी थी वो भी ख़त्म....खैर मेरे थकने का एक बहुत अच्छा लाभ भी मिला हम सबको के फिर हमने पूरे मन और शांति के साथ रात्रि की आरती का अविस्मरणीय आंनद लिया जो सबको नहीं मिलता शायद ,...😊

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    1. धन्यवाद डॉक्टर साहब । जी आरती में शामिल होना अविस्मरणीय रहेगा । भगवान जो करता है अच्छे के लिए ही करता है ।

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