Tuesday, 1 August 2017

Amarnath Yatra : Sheshnag to Panchtarni

अमरनाथ यात्रा

भाग 4 : शेषनाग से पंचतरणी

पिछले भाग से आगे :

अगले सुबह सभी 6 बजे से पहले ही उठ चुके थे लेकिन ठण्ड काफी होने के कारण बिस्तर में ही दुबके हुए थे । धीरे -2 एक- एक करके सभी दैनिक दिनचर्या से निर्वित होने लगे । मैं भी अपना कैमरा लेकर पीछे की तरफ बर्फ से लदी पहाड़ी की सूर्योदय के समय तस्वीरें लेने के लिये बाहर आ गया लेकिन चोटी पर तो पहले से ही काफ़ी धुप आ चुकी थी । जिस दृश्य की उम्मीद थी वो तो कब का जा चूका था । खैर कुछ फोटो लेकर मैं भी वापिस टेंट में आ गया और चलने की तैयारी करने लगा । चन्दन से उसका हाल-चाल पूछा, कल से बेहतर था लेकिन मुझे आशंका थी कि उसकी तबियत आज भी ख़राब हो सकती है क्योंकि आज हमें ज्यादा ऊँचाई से होकर जाना था।

ब्रह्मा ,विष्णु ,महेश 

जब सब लोग तैयार हो गए तो अपना अपना बैग लेकर यात्रा के लिये निकल लिये। कैंप से बाहर थोड़ा सा आगे की तरफ 3-4 लंगर हैं ।सभी नाश्ते के लिए लंगर पर चले गए । चाय के साथ ब्रेड टोस्ट,  रस और बिस्कुट मिल रहे थे । उन्ही से काम चलाया । यहीं पर ख़ूब घोड़े वाले मिल जाते हैं। देवेंदर और पाठक दादा ने तो यहीं से सीधा पंचतरणी के लिये घोड़े ले लिये । चन्दन को भी मैंने बहुत कहा लेकिन वो नहीं माना , बोला चाचा जी, आपके साथ पैदल ही जाऊँगा। महागुनुस टॉप तक के लिये घोड़ा लेने को भी नहीं माना । ठीक है जी ,जैसी इच्छा , चलो पैदल मार्च पर ।

शेषनाग से निकल कर शुरू का लगभग एक किलोमीटर का रास्ता सीधा और हलकी चढ़ाई वाला है, बीच में एक ग्लेशियर को भी पार करना पड़ता है जिस पर बर्फ और ढलान के कारण गिरने की काफी संभावना रहती है । यहाँ के बाद रास्ता बायीं तरफ धीरे-धीरे लगभग 90 डिग्री तक घूम जाता है जिसमे घाटी में नीचे नदी तक उतराई है । नदी पर बने पुल को पार करके पहाड़ी के दूसरी और तीखी चढाई है । यहाँ से आगे लगातार काफी चढ़ाई है । पुरा रास्ता पथरीला है ,इस पर यहाँ ऑक्सीजन की कमी इसे और भी दुर्गम बना देती है । हर दस कदम चलने के बाद ही लोग हांफने लगते हैं । थोड़ा रुक कर आराम करके फिर से अपनी मंजिल की और चल पड़ते हैं ।

शेषनाग से अगला पड़ाव बब्बल टॉप (3910 मीटर) है जो दो किलोमीटर की दुरी पर है । बब्बल टॉप पहुँचने से पहले चन्दन को फिर से सरदर्द की दिक्कत होने लगी ,स्वर्ण को भी साँस की दिक्कत हो रही थी ,इसलिए हम सब धीरे-धीरे ही चल रहे थे । लगभग ढेड़ घंटे में हम बब्बल टॉप  पहुँच गए ।यहाँ सुरक्षा बलों द्वारा यात्रिओं को गर्म जल पिलाया जा रहा था । यहाँ पर एक –दो लंगर भी थे यहाँ रुक कर थोड़ा आराम किया और हल्का नाश्ता भी किया और थोड़ी देर आराम कर फिर से यात्रा शुरू कर दी।

दूर से दिखने पर बब्बल टॉप सबसे ऊँचा दिखायी देता है लेकिन वहां पहुँच कर सामने विशाल तथा और भी कठिन चढ़ाई वाला महागुनौस टॉप दिखायी देता है । इसको लोग गणेश टॉप भी कहते हैं । यह बब्बल टॉप से आगे दो किलोमीटर की दुरी पर है और इस यात्रा का सबसे अधिक ऊँचाई वाला पॉइंट भी है । ये 4270 मीटर की ऊँचाई पर है। यहाँ भी ऑक्सीजन की काफी कमी है इसलिए यात्रियों को यहाँ ज्यादा देर रुकने नहीं दिया जाता । सुरक्षा बलों द्वारा यात्रिओं को आगे जाकर ही आराम करने की सलाह दी जाती है । यहाँ पर चारों तरफ बर्फ़ ही बर्फ़ थी और लोग अपनी थकावट को भूल कर भी बर्फ में मस्ती कर रहे थे । यहाँ से आगे लगातार उतराई है और काफी उतराई बर्फ में ही है जो काफी रिस्की है । लोग इस पर भी स्कीइंग कर फिसलते हुए सीधे नीचे उतर रहे थे । कुछ लोग नीचे खड़े होकर ऊपर से फिसल कर आने वाले यात्रियों को पकड़ कर रोक रहे थे ।

यहाँ से अगला पड़ाव पोशपत्री ( 3520 मीटर) पर है जो दो किलोमीटर की दुरी पर है। यहाँ पर दिल्ली के एक संगठन –‘शिव सेवक सेवा दल’ वालों का एक विशाल भंडारा है। यहाँ पहुँचने पर मोबाइल सिग्नल भी मिल जाता है । यहाँ हमें सुखविंदर और कमल भी मिल गए जो हमसे काफी पहले यहाँ पहुँच चुके थे । हमारे आते ही, वे हमें अब पंच तरणी पर ही मिलने को बोल कर आगे निकल गए। हम चारों यहाँ थोड़ी देर रुके । हल्का जलपान किया ,थोड़ा आराम किया और फिर से आगे की यात्रा शुरू कर दी । चन्दन की तबियत फिर से खराब होते देख उसे समझा कर घोड़े पर जाने के लिये राजी किया और उसे घोड़े पर भेज दिया । फोन पर सुखविंदर और देवेंदर को भी बता दिया कि चन्दन को घोड़े पर भेज दिया है उसे आगे पंचतरणी पर मिल लेना।

अब मैं ,सुशील और स्वर्ण तीनों ही पीछे थे बाकि सभी साथी हमसे आगे जा चुके थे । हम तीनों भी तेजी से चलने लगे । रास्ता भी बिना चढ़ाई का था तो दिक्कत भी कुछ नहीं थी । मेरे ये दोनों मित्र मेरे बचपन के दोस्त हैं ; एक ही गाँव के ,एक जैसी पृष्ठ भूमि के  ।हम एक साथ बहुत घुमे हैं ,अमरनाथ भी कम से कम 9-10 बार इकठ्ठे आ चुके हैं इसलिए इनसे खूब पटती है । आपस में हंसी मजाक करते हुए हम तेजी से जा रहे थे । हमने अगला ब्रेक दर्द्कोट जाकर ही लिया जो पंचतरणी से लगभग दो किलोमीटर पहले है । वहां रुककर चाय पी और फिर आगे पंचतरणी के लिये निकल गए । पंचतरणी से पहले एक विशाल और चौड़ी घाटी है जो लगभग एक किलोमीटर चौड़ी है इसमें पर्वत शिखरों से आ रही पंचतरणी नदी की पाँच धारा बहती हैं । इन्हें पार करके जैसे ही हमने पंचतरणी कैंप में प्रवेश किया तो हमें वहीँ अपने पाँचों साथी मिल गए। यहाँ के एक भंडारे में मेरी जानकारी थी, वहीँ जाकर बात की और रात्रि विश्राम के लिये वहीँ रुक गए ।              

अमरनाथ कथा : एक बार देवर्षि नारद कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर के स्थान पर दर्शनार्थ पधारे। भगवान शंकर उस समय वन विहार के लिए गए हुए थे और भगवती पार्वती यहां विराजमान थीं। पार्वती जी ने देवर्षि को आसन देकर कहा, ‘‘देवर्षि! कृपा अपने आने का कारण कहिए।’’

देवर्षि बोले, ‘‘देवी! भगवान शंकर के गले में मुंड माला क्यों है?’’

भगवान शंकर के वहां आने पर यही प्रश्र पार्वती जी ने उनसे किया। भगवान शंकर ने बताया, ‘‘जितनी बार तुम्हारा जन्म हुआ है उतने ही मुंड मैंने धारण किए हैं।’’

पार्वती जी बोलीं, ‘‘मेरा शरीर नाशवान है, परंतु आप अमर हैं इसका कारण बताएं।’’ 

भगवान शंकर ने कहा यह सब अमरकथा के कारण है। यह उत्तर सुनकर माता पार्वती के हृदय में भी अमरत्व प्राप्त करने की भावना पैदा हो गई और वह भगवान शंकर से शिव कथा सुनाने का आग्रह करने लगीं। शिव शंकर ने बहुत वर्षों तक इसे टालने का प्रयत्न किया, परंतु पार्वती जी के हठ के कारण उन्हें अमरकथा सुनाने को बाध्य होना पड़ा। अमरकथा सुनाने के लिए समस्या यह थी कि कोई अन्य जीव उस कथा को न सुने। इसलिए भगवान शंकर पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, आकाश और अग्नि) का परित्याग करके इन पर्वतमालाओं में पहुंच गए और श्री अमरनाथ गुफा में पार्वती जी को अमरकथा सुनाई।

 गुफा की ओर जाते हुए सर्वप्रथम जहां उन्होंने अपने नंदी (बैल) का परित्याग किया ,उस जगह का नाम बैलगाम पड़ा जो धीरे -2 बिगड़ कर पहलगाम के नाम से जाने जाना लगा ।  फिर चंदनबाड़ी में भगवान शिव ने अपनी जटाओं (केशों) से चंद्रमा को मुक्त किया। शेषनाग नामक झील पर पहुंच कर उन्होंने अपने गले से सर्पों को भी उतार दिया। प्रिय पुत्र श्री गणेश जी को भी उन्होंने महागुनस पर्वत पर छोड़ देने का निश्चय किया। फिर पंचतरणी पहुंच कर शिव जी ने पांचों तत्वों का परित्याग किया। सब कुछ छोड़-अंत में भगवान शिव ने पार्वती संग एक गुफा में महादेव ने प्रवेश किया। कोर्इ तीसरा प्राणी, यानी कोर्इ कोई व्यक्ति, पशु या पक्षी गुफा के अंदर घुस कथा को न सुन सके इसलिए उन्होंने चारों ओर अग्नि प्रज्जवलित कर दी। फिर महादेव ने जीवन के गूढ़ रहस्य की कथा शुरू कर दी।

कथा सुनते-सुनते देवी पार्वती को नींद आ गई और वह सो गईं, जिसका शिवजी को पता नहीं चला। भगवन शिव अमर होने की कथा सुनाते रहे। उस समय गुफ़ा में पहले से मौजूद दो सफेद कबूतर शिव जी से कथा सुन रहे थे और बीच-बीच में गूं-गूं की आवाज निकाल रहे थे। शिव जी को लगा कि माता पार्वती कथा सुन रही हैं और बीच-बीच में हुंकार भर रहीं हैं। इस तरह दोनों कबूतरों ने अमर होने की पूरी कथा सुन ली। कथा समाप्त होने पर शिव का ध्यान पार्वती की ओर गया, जो सो रही थीं। जब महादेव की दृष्टि कबूतरों पर पड़ी, तो वे क्रोधित हो गए और उन्हें मारने के लिए आगे बड़े।

इस पर कबूतरों ने भगवान शिव से कहा कि, 'हे प्रभु हमने आपसे अमर होने की कथा सुनी है यदि आप हमें मार देंगे तो अमर होने की यह कथा झूठी हो जाएगी। इस पर शिव जी ने कबूतरों को जीवित छोड़ दिया और उन्हें आशीर्वाद दिया कि तुम सदैव इस स्थान पर शिव पार्वती के प्रतीक चिन्ह के रूप निवास करोगे। अत: यह कबूतर का जोड़ा अजर-अमर हो गया। आज भी इन दोनों कबूतरों के दर्शन भक्तों को यहां प्राप्त होते हैं। और इस तरह से यह गुफा अमर कथा की साक्षी हो गई व इसका नाम अमरनाथ गुफा के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

आज की यात्रा के कुछ महत्व पूर्ण पड़ाव ।
शेषनाग – 3720  मीटर पर।
बब्बल टॉप -3910 मीटर ,शेषनाग से 2 किलोमीटर आगे  (समय ढेड़ से 2 घंटे )
महागुनुस टॉप - 4270 मीटर, बब्बल टॉप से 2 किलोमीटर आगे (समय ढेड़ से 2 घंटे)
पोशपत्री -3520 मीटर, महागुनुस टॉप से 2 किलोमीटर आगे (समय 1 घंटा)
केलनार -3560 मीटर- पोशपत्री से 4 किलोमीटर आगे (समय 2 घंटे)
दर्द्कोट  -3560 मीटर- केलनार से 2 किलोमीटर आगे (समय 1 घंटा)
पंचतरणी -3660 मीटर- दर्द्कोट से 2 किलोमीटर आगे (समय 1 घंटा)

इस पोस्ट में इतना ही ।जल्द मिलते हैं अगली पोस्ट में पवित्र गुफा तक की यात्रा में:




शेषनाग कैंप 
शेषनाग से आगे 

बब्बल टॉप के रास्ते में 





महागुनुस टॉप 

महागुनुस टॉप 








चन्दन @ चिरंजीव 


सुशील 

लोग फिसल कर नीचे उतरते हुए 

महागुनुस टॉप 

चन्दन ,मैं ,सुशील और स्वर्ण 





चन्दन के चेहरे से दिख रहा है वो ठीक महसूस नहीं कर रहा 



पोशपत्री  की ओर

पोशपत्री 

पोशपत्री  में शिव परिवार 

बचपन के य़ार 

पंचतरणी की ओर

पंचतरणी घाटी 

कमल और सुखविंदर 

29 comments:

  1. बहुत सुंदर वर्णन नरेश जी साथ ही अमरनाथ कथा भी
    वाह
    जय हो बाबा बर्फानी

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    1. धन्यवाद अजय जी , जय बाबा बर्फानी .

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  2. Bahut hi sunder post naresh ji aur pics to bahut hi lajwab hai..agli post ka intzar rhega..jai bholenath

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    1. धन्यवाद प्रतिमा जी .

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  3. Bahut hi sunder post naresh ji aur pics to bahut hi lajwab hai..agli post ka intzar rhega..jai bholenath

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  4. बहुत ही ज्ञानवर्धक आलेख सहगल साहब, और पोस्ट के अंत में आपने जो एक जगह से दूसरे जगह की दूरी और तय करने में लगे समय का जो विवरण दिया है उसका तो कोई जवाब ही नहीं, और फोटो तो सभी के सभी नयनाभिराम हैं।

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    1. धन्यवाद अभयानन्द जी .

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  5. जानकारी हेतु बढ़िया लेख

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    1. धन्यवाद महेश जी.

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  6. उपयोगी जानकारी देती आपकी पोस्ट,,,सुंदर यात्रा लेख

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    1. धन्यवाद त्यागी जी

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  7. शानदार यात्रा वृतान्त जय बाबा बर्फानी

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    1. धन्यवाद वसंत पाटिल जी

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  8. Nice Post with a lot of information and beautiful pictures. Thanks for sharing.

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    1. धन्यवाद अजय जी .

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  9. बहुत शानदार और सुंदर यात्रा वृतांत साथ ही अमरनाथ कथा भी और फोटो तो एक से बढ़कर एक सुंदर ..

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    1. धन्यवाद नटवर लाल भार्गव जी

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  10. वाह सहगल साहब फोटो बहुत ही शानदार हैं और आपका लेख भी...।

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    1. धन्यवाद अनिल जी.

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  11. Very well narrated with beautiful pictures.Always stay blessed .Jai Gauri Shankar Ji ki.

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  12. सहगल साहब मुझे आपके ब्लॉग से अमरनाथ की कहानी पता चली बहुत अच्छा लगा...मुझे पता नहीं था इस बारे में

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    1. धन्यवाद प्रतीक जी . बहुत से लोग अमरनाथ की कहानी नहीं जानते .मुझे भी वहां जाने के बाद ही मालूम हुआ .

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  13. बढ़िया जानकारी समेटे हुए....उम्दा लेखन...शानदार चित्र...👌

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  14. धन्यवाद डॉ साहेब ।।💐💐

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  15. एक बेहतरीन यात्रा का शानदार वर्णन !! पोषपत्री नाम पहली बार सुना मैंने

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    1. धन्यवाद योगी जी .पोषपत्री विकट स्थान है लेकिन तभ भी यहाँ सबसे बड़ा भंडारा लगाया जाता है

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  16. जय बाबा अमरनाथ जी की । हमेशा की तरह शानदार पोस्ट । कठिनाइयों को पार करते हुए अमरनाथ जी की यात्रा वात्सव में कठीन है । फ़ोटो शानदार है

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    1. धन्यवाद रीतेश जी .संवाद बनाये रखिये .

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