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Friday, 9 February 2018

Uttrakhand Yatra :Anusuya Devi Temple

रुद्रनाथ यात्रा : अनसूया माता मंदिर से मंडल

कंडिया बुग्याल में खाने पीने में ही 40-45 मिनट लग गए; इस समय शाम के 6:30 हो चुके थे और हल्का अंधेरा होना शुरू हो गया था। छानी वाले की इच्छा थी की हम रात को उसके पास ही रुक जाएँ। हमने आपस में विचार विमर्श किया तो सभी की सलाह थी कि आगे चलते हैं, बाबा जी भी पहले से ही तैयार थे। बस फिर क्या था सबने अपने अपने बैग उठाएं और अनसूया मंदिर की तरफ चल दिए। कंडिया बुग्याल (2346 मीटर) से अमृत गंगा नदी (2020 मीटर) तक नीचे 2 किलोमीटर की तीखी उतराई है।

अमृत गंगा
बाबाजी बड़ी तेजी से नीचे उतर रहे थे और हम सब उनके पीछे-पीछे। कंडिया बुग्याल के बाद घना जंगल है। वैसे भी दिन की रोशनी कम हो चुकी थी ,घने जंगल के कारण बची खुची रोशनी भी खत्म हो गयी । अंधेरा होने के कारण चलना भी मुश्किल हो गया था। सभी ने अपने मोबाइल की टॉर्च जला ली थी, मेरे पास एक छोटी सी टोर्च थी, मैंने वह जला रखी थी और मैं सबसे पीछे रोशनी करता हुआ चल रहा था। रास्ते में बाबा जी से बात होती रही, मालूम हुआ बाबा जी पंजाब से है और पढ़े लिखे हैं। उन्होंने  ग्रेजुएशन किया हुआ है लेकिन जब दुनिया से मोहभंग हो गया तो यहां सुनसान रमणीक जगह पर आकर डेरा डाल लिया । बाबा जी बता रहे थे कि यहाँ रात के समय जंगली जानवर भोजन की तलाश में अक्सर रास्ते में आ जाते हैं इसलिए वो यहाँ अकेले नहीं आ रहे थे । अमृत गंगा नदी तक नीचे उतरने में हमें लगभग एक घंटा लगा, यहां भी लकड़ी का एक छोटा सा अस्थाई पुल बना हुआ था। जिसे हमने बाबा जी के कहे अनुसार बड़ी सावधानी से पार किया और आगे की तरफ चल दिए।

थोड़ा सा आगे बढ़ने पर रास्ते के बाई तरफ से अत्री गुफा का रास्ता अलग हो जाता है। यहां से अत्री गुफा दो सौ  मीटर दूर है । बाबाजी ने बताया था कि 4-5  दिन पहले तक नवरात्रि का  मेला लगने के कारण गुफ़ा में सामान काफी अस्त-व्यस्त पड़ा है नहीं तो मैं आप लोगों को यही ठहरा लेता, मुझे भी अच्छा नहीं लग रहा कि मैं आपको आगे भेज रहा हूं; लेकिन आप सुबह यहाँ जरूर आना, आप सब मेरी तरफ से चाय के लिए आमंत्रित है। सुबह मैं आपको अत्रि मंदिर ले चलूंगा जो नदी को पार करके दूसरी तरफ थोड़ी दुरी पर है। बाबा जी से वहीँ विदा ले, गुफा को बाहर से ही प्रणाम कर हम अनसूया मंदिर की तरफ चल दिए। अनसूया मंदिर यहाँ से लगभग एक किलोमीटर दूर है और हलकी चढ़ाई है । लगभग आधे घंटे में हम अनसुईया देवी मंदिर (2110मीटर) पहुंच गए। मंदिर का मुख्य द्वार बंद था, हमने मंदिर के बाहर टंगी हुई घंटी बजाई तो सामने एक कमरे से एक पंडित जी निकल कर बाहर आ गए । मैने उनसे  कहा कि हमें रात ठहरने के लिए कमरा चाहिए तो उन्होंने मना कर दिया और बोले यहाँ कोई कमरा नहीं है। मैंने कहा पंडित जी क्यों झूठ बोलते हो, मुझे मालूम है यहां धर्मशाला है और कमरे भी है। वो बोला हां है, लेकिन पुजारी जी रुद्रनाथ गए हैं और चाबी साथ ले गए हैं; उधर सामने होटल है वहां चले जाओ।

मुझे मालूम था यह व्यक्ति झूठ बोल रहा है पर पता नहीं वो ऐसा क्यों कर रहा था ? इस बीच हमारी बातचीत सुनकर एक और स्थानीय व्यक्ति वहाँ आ गया और बोला आप मेरे साथ आओ। मंदिर के पास ही उसकी चाय की दुकान थी उसने हमें वो जगह दिखायी और कहा आप यहां सो सकते हो तो सो जाओ । हमने कहा ठीक है ,हमें कोई दिक्कत नहीं है। थोड़ी देर में वो घर से जाकर सबके लिए रजाई ले आया। इस समय हमें किसी को भी खाने की भूख नहीं थी क्योंकि थोड़ी देर पहले ही कंडिया बुग्याल में सब खा पीकर आए थे। हम सब अपनी-अपनी रजाई में घुस गए । थोड़ी देर में वह दुकान वाला हमारे बिना कहे ही सबके लिए चाय बनाकर ले आया और चाय भी बढ़िया बनाई थी। चाय पीकर थोड़ी देर उससे बातचीत करते रहे और फिर  सब अपनी-अपनी रजाई में घुस कर सो गए। चाय की दुकान के पीछे की तरफ कुछ घोड़े बंधे हुए थे जो सारी रात अपनी आवाज से तंग करते रहे लेकिन कल 24 किलोमीटर चलने की थकावट के कारण नींद आ ही गई।

सुबह उठ कर हाथ मुंह धोकर अनसूया देवी मंदिर में गए तो वहां मंदिर के पुजारी जी मिले। मैंने उनसे पूछा पुजारी जी यहाँ रुकने के लिए कमरे नहीं है क्या? पुजारी जी बोले किसने कहा है? यहाँ कमरे हैं और सभी खाली पड़ें हैं । मैंने बताया कि रात को कोई दूसरे पंडित जी आए थे और वह मना कर रहे थे और गर्मी भी खा रहे थे। तो वह पुजारी जी बोले कौन था वो ? जिसने भी तुम्हें बताया झूठ बताया,यहाँ पर कमरे हैं और उनकी चाबी मेरे पास ही है । आप मंदिर की घंटी बजाते तो मैं आ जाता । मैंने कहा महाराज घंटी तो बजाई थी लेकिन कोई दूसरा पंडित आ गया था। कोई बात नहीं , अब तो रात कट गई है ।

इसके बाद सभी ने अनसूया देवी मंदिर में जाकर माता के दर्शन किये और प्रणाम किया और अपने फाइव स्टार होटल में वापस आ गए। तब तक दुकानदार बढ़िया चाय बना कर ले आया । चाय पीकर हमने आगे मंडल की तरफ चलने का निश्चय किया हमने दुकान वाले को ₹500 दिए, वह ले नहीं रहा था बोला यह बहुत ज्यादा है ! हमने कहा ये ज्यादा नहीं है आप रख लो । दुकानदार बड़ा खुश हुआ ,उसने हमें आगे का एक शोर्ट कट रास्ता भी समझा दिया। हम वहाँ से निकल कर मंडल की ओर चल दिए।

 मंडल यहां से 5 किलोमीटर की दूरी पर है लेकिन सारी उतराई है इसलिए चिंता की बात नहीं थी। करीब एक किलोमीटर आगे एक पौराणिक शिलालेख मिलता है। यह शिलालेख ब्राह्मी लिपि और संस्कृत में लिखा गया है। इसके अनुसार महाराज परमेश्वर सर्वरमन ने यहाँ पर एक कुण्ड का निर्माण करवाया था। यह शिलालेख छठी शताब्दी मध्य ईसवी का है। शिलालेख को संरक्षित करने के लिए इसके ऊपर टिन शेड का निर्माण भी करवाया गया है। शिलालेख देखने के बाद सीधे मण्डल की ओर बढ़ चले। घने जंगल, और कल-कल बहती अमृतगंगा की धारा के साथ-साथ आगे बढ़ना बहुत ही मनमोहक था। पूरा रास्ता अच्छा बना है और अमृत गंगा नदी रास्ते के साथ साथ ही चलती है और काफी सुंदर दृश्य देखने को मिल रहे थे। मंडल तक का रास्ता आसान ही है पूरा पक्का बना हुआ है लोगों की आवाजाही काफी रहती है। मंडल से थोड़ा पहले ही सिरोली गाँव है औत आख़िरी का एक किलोमीटर तो गाँव से होकर ही है ।हम सुबह नौ बजने से कुछ पहले ही मंडल गाँव(1550मीटर) पहुँच गए ।

 आज से ठीक 2 दिन पहले सुबह 9:00 बजे हम सगर गांव में रुद्रनाथ द्वार पर खड़े थे और आज 9:00 बजे मंडल गांव के गेट पर । 2 दिन में हमने रुद्रनाथ जी की कुल 41-42 किलोमीटर   की चढ़ाई उतराई पूरी कर ली। अनसुईया देवी गेट के सामने ही एक होटल है उससे कुछ घंटे के लिए एक कमरा ले लिया ताकि नहा धोकर तैयार हो सके। सुशील और सुखविंदर कमरे में चले गए। मैं , गौरव और सागर शेयर्ड-टैक्सी में बैठ कर सगर चले गए, जहाँ मेरी कार और गौरव की मोटर साइकिल खाड़ी थी । वहां पहुँचकर गौरव और सागर ने अपना सामान गाड़ी से लिया और गोपेश्वर होते हुए अपने घर गाजियाबाद को निकल गए। उन्हें आज रात घर पर पहुंचना था ताकि कल सुबह वो अपने ऑफिस जा सके । मैं अपनी कार लेकर मंडल आ गया ।

अनसूया मन्दिरअनसूया में महर्षि अत्रि मुनि की धर्म पत्नी सती माता अनसूया का मन्दिर है। मान्यता है कि इस मन्दिर में पूजा-अर्चना करने वाले विवाहित जोड़े को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। कर्दम ऋषि की कन्या और सांख्यशास्त्र के प्रवक्ता कपिलदेव की बहन सती अनसूया महर्षि अत्री की पत्नी थी। जो अपने पतिव्रता धर्म के कारण सुविख्यात थी। एक दिन देव ऋषि नारद जी  बारी-बारी से विष्णुजीशिव जी और ब्रह्मा जी की अनुपस्थिति में विष्णु लोक, शिवलोक तथा ब्रह्मलोक पहुंचे। वहां जाकर उन्होंने लक्ष्मी जी, पार्वती जी और सावित्री जी के सामने अनसूया के पतिव्रत धर्म की बढ़ चढ़ के प्रशंसा की तथा कहाँ की समस्त सृष्टि में उससे बढ़ कर कोई पतिव्रता नहीं है। नारद जी की बाते सुनकर तीनो देवियाँ सोचने लगी की आखिर अनसूया के पतिव्रत धर्म में ऐसी क्या बात है जो उसकी चर्चा स्वर्गलोक तक हो रही है ? तीनो देवीयों को अनसूया से ईर्ष्या होने लगी।नारद जी के वहां से चले जाने के बाद सावित्री , लक्ष्मी तथा पार्वती एक जगह  इक्ट्ठी हुई तथा अनसूया के पतिव्रत धर्म को खंडित कराने के बारे में सोचने लगी। उन्होंने निश्चय किया की हम अपने पतियों को वहां भेज कर अनसूया का पतिव्रत धर्म खंडित कराएंगे। ब्रह्मा, विष्णु और शिव जब अपने अपने स्थान पर पहुँचे तो तीनों देवियों ने उनसे अनसूया का पतिव्रत धर्म खंडित कराने की जिद्द की। तीनों देवों ने बहुत समझाया कि यह पाप हमसे मत करवाओ। परंतु तीनों देवियों ने उनकी एक ना सुनी और अंत में  तीनो देवो को इसके लिए राज़ी होना पड़ा।

तीनों देवो ने साधु वेश धारण किया तथा अत्रि ऋषि के आश्रम पर पहुंचे। उस समय अनसूया जी आश्रम पर अकेली थी। साधुवेश में तीन अत्तिथियों को द्वार पर देख कर अनसूया ने भोजन ग्रहण करने का आग्रह किया। तीनों साधुओं ने कहा कि हम आपका भोजन अवश्य ग्रहण करेंगे। परंतु एक शर्त पर कि आप हमे निवस्त्र होकर  भोजन कराओगी। अनसूया ने साधुओं के शाप के भय से तथा अतिथि सेवा से वंचित रहने के पाप के भय से परमात्मा से प्रार्थना की कि हे परमेश्वर ! इन तीनों को छः-छः महीने के बच्चे की आयु के शिशु बनाओ। जिससे मेरा पतिव्रत धर्म भी खण्ड न हो तथा साधुओं को आहार भी प्राप्त हो व अतिथि सेवा न करने का पाप भी न लगे। परमेश्वर की कृपा से तीनों देवता छः-छः महीने के बच्चे बन गए तथा अनसूया ने तीनों को निःवस्त्र होकर दूध पिलाया तथा पालने में लेटा दिया।

जब तीनों देव अपने स्थान पर नहीं लौटे तो देवियां व्याकुल हो गईं। तब नारद ने वहां आकर सारी बात बताई की तीनो देवो को तो अनसूया ने अपने सतीत्व से बालक बना दिया है। यह सुनकर  तीनों देवियां ने अत्रि ऋषि के आश्रम पर पहुंचकर माता अनसूया से माफ़ी मांगी और कहाँ की  हमसे ईर्ष्यावश यह गलती हुई है। इनके लाख मना करने पर भी हमने इन्हे यह घृणित कार्य करने भेजा। कृप्या आप इन्हें पुनः उसी अवस्था में कीजिए। आपकी हम आभारी होंगी। इतना सुनकर अत्री ऋषि की पत्नी अनसूया ने तीनो बालक को वापस उनके वास्तविक रूप में ला दिया। अत्री ऋषि व अनसूया से तीनों भगवानों ने वर मांगने को कहा। तब अनसूया ने कहा कि आप तीनों हमारे घर बालक बन कर पुत्र रूप में आएँ। हम निःसंतान हैं। तीनों भगवानों ने तथास्तु कहा तथा अपनी-अपनी  पत्नियों के साथ अपने-अपने लोक को प्रस्थान कर गए। कालान्तर में दतात्रोय रूप में भगवान विष्णु का , चन्द्रमा के रूप में ब्रह्मा का तथा दुर्वासा के रूप में भगवान शिव का जन्म अनसूया के गर्भ से हुआ।

अभी बस इतना ही ... अगले पार्ट में आपको चोपता और उखीमठ के ओम्कारेश्वर मंदिर ले चलेंगे , तब तक आप यहाँ तक की तस्वीरें देखिये ।

इस यात्रा के पिछले भाग पढ़ने के लिए नीचे लिंक उपलब्ध हैं ।
उत्तराखंड यात्रा 1 : अम्बाला से रुद्रप्रयाग
उत्तराखंड यात्रा 2: कार्तिक स्वामी   
उत्तराखंड यात्रा 4: कल्पेश्वर महादेव

मंदिर द्वार 

अनसूया मंदिर 

अनसूया मंदिर


अनसूया मंदिर


हमारा फाइव स्टार होटल 

होटल का मालिक सुखविंदर के साथ 









सिरोली गाँव 


यात्रा यहीं से शुरू होती है 
अनसूया देवी मंदिर -बीनू भाई के सौजन्य से 

अमृत गंगा 

बहुत खुश है ,आज हरी मिर्च मिलेगी 

अमृत गंगा 

अमृत गंगा 







मंडल की तरफ जाने वाला रास्ता 

मंडल की तरफ जाने वाला रास्ता 

मंडल की तरफ जाने वाला रास्ता 



मंडल की तरफ जाने वाला रास्ता 

मंडल की तरफ जाने वाला रास्ता 


मंडल पहुँच गए

22 comments:

  1. जय भोलेनाथ...🙏

    इसमें अत्रि मुनि गुफा का जिक्र नहीं है वहां नहीं गये क्या

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    1. धन्यवाद अनिल भाई .रात होने के कारन अत्री गुफा नहीं गए .

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    2. सबसे शानदार जगह छूट गयी आपसे वहा के स्वामी जी बहुत बढ़िया व्यक्ति है हम करीब 2 घण्टे उनके आश्रम रूपी कुटिया में रहे

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  2. पौराणिक जानकारी से भरी पोस्ट

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    1. धन्यवाद विनोद भाई .

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  3. आपके साथ की गयी इस यात्रा में बहुत मजा आया और इसे पढ़कर ये सुख दोबारा मिला

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    1. धन्यवाद गौरव भाई .

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  4. बहुत बढ़िया नरेश जी

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    1. धन्यवाद राजेश जी .

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  5. बहुत बढ़िया सहगल साब !! आदमी थका हुआ हो तो फिर न वो जगह देखता है और न घोड़ों की आवाज से "डिस्टर्ब " होता है :) शानदार ट्रैकिंग रही आपकी

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    1. धन्यवाद योगी भाई ।सही फ़रमाया आपने ,थकावट हो तो कहीं भी नींद आ सकती है ।

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  6. वाह अनुसुइया देवी की कथा पढ़कर बहुत अच्छा लगा ऑयर पता चला कि पत्नियों के आगे देवाधि देवो की भी नही चलती....आज फिर पता चला कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है जहां मंदिर के पंडित ने रुकने से मना के दिया और वही उस इंसान ने रुकने के लिए दिल खोल दिया....

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    1. धन्यवाद प्रतीक भाई । सही कहा पत्नी के आगे तो भगवान की भी नही चलती ।😊😊😊

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  7. Nice informative post. jai Anusuya mata.

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  8. Nice informative post. jai Anusuya mata.

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    1. धन्यवाद अजय भाई .

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  9. जानकारी व सुंदर फोटो से लबालब पोस्ट

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    1. धन्यवाद सचिन त्यागी जी .

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  10. सारी यात्रा जोरदार रही और एकसाथ पढ़ने में ज्यादा आनंद आता है ☺ जै भोलेनाथ की

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    1. धन्यवाद बुआ जी .जय भोले नाथ .

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  11. दुर्गम यात्राऐ तथा सुन्दर तस्वीरों और शब्दों के माध्यम से श्रेष्ठ अभिव्यक्ति । सहगल जी आप बडे भाग्यशाली हैं ।

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