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Thursday, 31 May 2018

Sri-Ramanathaswamy-Temple - Rameshwaram Jyotirling

रामेश्वरम यात्रा - ज्योतिर्लिंग दर्शन ( Rameshwaram Jyotirling )

इस सीरीज को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें ।

यात्रा तिथि : 31 दिसम्बर 2017  
अगले दिन सुबह ट्रेन अपने निर्धारित समय पर रामेश्वरम स्टेशन पहुँच गयी । थोड़ी देर पहले जब ट्रेन समुंदर पर बने पम्बन ब्रिज को पार कर रही थी ,तब पुल से गुजरने के कारण होने वाली भारी आवाज से मेरी आँख खुल गयी थी और मैं समझ गया था कि ट्रेन अब समुंदर पार कर जल्दी ही रामेश्वरम पहुँचने वाली है । उस समय काफी अँधेरा था और ट्रेन भी काफी धीमी गति से चल रही थी। रात के समय ट्रेन के डिब्बों से सागर के पानी पर पड़ रही रोशनी बड़ा ही सुदर दृश्य उत्पन्न कर रही थी ,यूँ लग रहा था जैसी किसी ने सागर के गले चमचमाती हुई माला डाल दी हो।

मंदिर गलियारा 


ट्रेन के रामेश्वरम पहुँचते ही सभी लोग अपना अपना सामान लेकर ट्रेन से नीचे उतर गए । ट्रेन का ये आखिरी स्टेशन था । हम भी अपना सामान लेकर प्लेटफ़ॉर्म से बाहर आ गये । बहुत से ऑटो रिक्शा वाले प्लेटफ़ॉर्म पर ही हमें मंदिर ले जाने के लिए कहने लगे । जाना तो हमें था ही या यूँ कहो की यहाँ आने वाले लोगों में से स्थानीय लोग छोड़ दें तो सभी को मंदिर ही जाना था । लेकिन मेरा विचार था कि अपना जरूरी सामान एक पिठ्ठू बैग में लेकर बाकि का सारा सामान यहीं क्लॉक रूम में जमा करवा देते हैं ताकि उसे उठाने का झंझट ही न हो !! स्टेशन पर क्लॉक रूम का पता किया , मिल भी गया, रामेश्वरम एक छोटा सा स्टेशन है ढूंढने में जयादा दिक्कत नहीं हुई लेकिन बुकिंग क्लर्क मौजूद नहीं था । उसकी भी खोजबीन की तो पता चला कि अभी वो टिकेट काउंटर पर टिकेट बेच रहा है । उसके पास दोनों का चार्ज हैं, इसलिए ट्रेन जाने के बाद ही वो क्लॉक रूम में आयेगा ,तब तक हमें इंतजार करना पड़ेगा। गाड़ी जाने में अभी आधा घंटा से अधिक समय था इसलिए उसकी इंतजार न करके हम सारे सामान सहित ही मंदिर की तरफ चल दिए । ऑटो रिक्शा वाले ने बताया की आपको मंदिर के बाहर ही लॉकर और कमरे भी मिल जायेंगे जहाँ आप सामान भी रख सकते हो और आराम भी कर सकते हो ।

मंदिर रेलवे स्टेशन से ज्यादा दूर नहीं है ,मात्र दो किलोमीटर ही है। 5-7 मिनट में ही हमें ऑटो वाले ने मंदिर के पश्चिमी द्वार के सामने उतार दिया । सबसे पहले ये ही द्वार पड़ता है । वहाँ उतर कर एक गेस्ट हाउस में हमने 200 रूपये में दो बड़े लॉकर ले लिए साथ में नहाने और आराम करने की सुविधा भी । गेस्ट हाउस वाले ने ही हमें बताया की आप पहले अग्नि तीर्थ (समुंदर ) में स्नान करके आओ, फिर मंदिर के सभी कुंड में स्नान करना फिर यहाँ आकर दोबारा स्नानकर तैयार होकर भगवान के दर्शन करना । हम भी अपना झोला उठाकर अग्नि तीर्थ की तरफ चल दिए । काफी लोग उधर ही जा रहे थे तो रास्ता पूछने की जरूरत नहीं पड़ी । पहले मंदिर के बाएं तरफ़ जाना है और थोड़ा आगे जाकर दायें तरफ मुड जाना है आप मंजिल पर पहुँच जाओगे। अग्नि तीर्थ असल में रामेश्वरम मंदिर के पास एक बीच है जो ज्यादा दूर नहीं है , मंदिर के पश्चिमी द्वार से दुरी मात्र आध किलोमीटर और पूर्वी द्वार से मात्र 50 मीटर ही होगी ।

अग्नि तीर्थ : त्रेता युग में भगवान राम जब लंका के राजा रावण को परास्त कर सीता को उसकी कैद से छुड़ा लाये थे तो भगवान राम के कहने पर माता सीता ने अग्नि का आह्वान कर उसमे प्रवेश किया और अपनी पवित्रता साबित की। अग्नि के यहाँ प्रकट होने के कारण ही इस स्थान को अग्नि तीर्थ कहा जाता है । तुलसीदास रचित रामचरित मानस के अयोध्या कांड में लिखा है कि असल में सीता जी के प्रतिरूप (छाया ) का ही अपहरण हुआ था और उनका वास्तविक रूप अग्नि में सुरक्षित था । अपने असल रूप को पाने के लिए सीता जी के प्रतिरूप ने अग्नि में परवेश किया और वास्तविक रूप अग्नि से बाहर आया ।”

जब हम लोग अग्नि तीर्थ पहुँचे तो वहाँ सैंकड़ो लोग पहले ही स्नान कर रहे थे ।मैं भी जल्दी से अपने बेटे को उठा कर समुंदर में नहाने चला गया । वैसे सागर का खारा पानी होने के कारण मुझे इसमें नहाने का मजा नहीं आता क्योंकि कितनी भी कोशिश कर लो कुछ पानी तो मुहँ में चला ही जाता है । नहाते हुए जब मेरी सामने की तरफ निगाह पड़ी तो देखो सामने आसमान काफी लाल हो रहा था यानि की सूर्योदय होने वाला हैं ।मैं झटपट से बाहर आ गया और जल्दी से बैग से कैमरा बाहर निकाला । आज मुझे भी समुंदर से निकलते हुए सूर्य देव के फोटो लेने का मौका मिल रहा था । अगले 15-20 मिनट तक सूर्योदय के फोटो लेता रहा । तक तक मेरी पत्नी भी स्नान कर आ चुकी थी । हम दोबारा गेस्ट गए और अपना कैमरा ,फ़ोन और बैग भी लॉकर में रख कर मंदिर चले गए ।

मंदिर में जाने पर पता चला की कुंड स्नान की पर्ची पूर्वी द्वार के बाहर मिलती है ।वहाँ पहुँचे ,लम्बी लाइन लगी थी । कुंड स्नान के लिए 25 रूपये का टिकट लगता है। लगभग आधा घंटा लाइन में लगने के बाद हमने भी दो टिकेट लिए और कुंड स्नान के लिए चले गए । मन्दिर परिसर में 24 कुंड है, जिसमें से दो या तीन  कुंड सुख चुके हैं लेकिन बाकि कुंडों में पानी है। 22वें कुंड में सभी कुंडों का पानी है ,जो लोग इन सभी कुंडों में स्नान न करना चाहें उनके लिए इस 22वें कुंड में स्नान करना ही पर्याप्त है। कुंडों में स्नान करने के बाद हम फिर से एक बार गेस्ट हाउस गए । वहाँ जाकर एक बार फिर से साफ पानी से नहाये और कपड़े बदल कर दर्शन के लिए फिर से मंदिर में चले गए । मंदिर में गीले वस्त्र पहन कर दर्शन करना सख्त मना है।

मंदिर में काफी भीड़ थी और लाइन भी काफी लम्बी हो चुकी थी और हम सुबह से भाग दौड़ में काफी थक भी गए थे इसलिए 50 रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से स्पेशल दर्शन की पर्ची लेकर दर्शन के लिए लाइन में लग गए। कुछ देर बाद भोले नाथ के बढ़िया दर्शन किये और फिर मंदिर परिसर में ही बने कुछ अन्य मंदिर में दर्शन करने के बाद वापिस गेस्ट हाउस आ गए। हमारा अगला प्रोग्राम यहाँ से मदुरै जाकर मीनाक्षी मंदिर देखना था । वैसे तो रामेश्वरम के पास धनुषकोडि बीच जा सकते थे लेकिन वहाँ देखने को अब सिर्फ बीच ही है । राम सेतु तो अब दिखायी नहीं देता इसलिए मैंने पहले ही मीनाक्षी मंदिर जाना तय कर रखा था । वहीँ से रात को कन्याकुमारी के लिए ट्रेन में रिजर्वेशन थी । इसलिए हम बिना समय गवाएँ रेलवे स्टेशन चले गए और वहाँ से मदुरै जाने वाली गाड़ी पकड़ ली ।     
  
अब कुछ जानकारी रामेश्वरम के बारे में:           
हिंदू धर्म में तमिलनाडु के रामनाथपुरम में स्थित रामेश्वरम ज्योतिर्लिग एक विशेष स्थान रखता है। यहां स्थापित शिवलिंग बारह द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक माना जाता है। साथ ही यह सनातन धर्म के चार धामों में से एक है। विशाल भारत देश को एकता-सूत्र में बांधे रखने के लिए परम पवित्र चार धामों की स्थापना चार दिशाओं में की गई है। उत्तर में हिमालय की गोद में बद्रीनाथ, पश्चिम में द्वारिकापुरी, पूर्व में जगन्नाथ पुरी तथा सुदूर दक्षिणी छोर पर स्थित है, चौथा धाम रामेश्वरम् तीर्थ। कहा जाता है कि रामेश्वरम ज्योतिर्लिग की विधिपूर्वक आराधना करने से मनुष्य ब्रह्महत्या जैसे महापाप से भी मुक्त हो जाता है और जो भी श्रद्धालु ज्योतिर्लिग पर गंगाजल चढ़ाता है, वह साक्षात जीवन से मुक्त हो जाता है और मोक्ष को प्राप्त कर लेता है।

पौराणिक कथा:
जितना प्रसिद्ध दक्षिण का रामेश्वरम मंदिर है उतना ही इसका पुराना इतिहास है। कहते हैं कि भगवान श्री राम जब रावण का वध करके और माता सीता को कैद से छुड़ाकर अयोध्या जा रहे थे तब उन्होंने मार्ग में गन्धमादन पर्वत पर रुक कर विश्राम किया था। उनके आने की खबर सुनकर ऋषि-महर्षि उनके दर्शन के लिए वहां पहुंचे। ऋषियों ने उन्हें याद दिलाया कि उन्होंने पुलस्त्य कुल का विनाश किया है, जिससे उन्हें ब्रह्म हत्या का पातक लग गया है। श्रीराम ने पाप से मुक्ति के लिए ऋषियों के आग्रह से ज्योतिर्लिग स्थापित करने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने हनुमान से अनुरोध किया कि वे कैलाश पर्वत पर जाकर शिवलिंग लेकर आएं लेकिन हनुमान शिवलिंग की स्थापना की निश्चित घड़ी पास आने तक नहीं लौट सके। जिसके बाद सीताजी ने समुद्र के किनारे की रेत को मुट्ठी में बांधकर एक शिवलिंग बना डाला। श्रीराम ने प्रसन्न होकर इसी रेत के शिवलिंग को प्रतिष्ठापित कर दिया। यही शिवलिंग रामनाथ कहलाता है। बाद में हनुमान के आने पर उनके द्वारा लाए गए शिवलिंग को उसके साथ ही स्थापित कर दिया गया। इस लिंग का नाम भगवान राम ने हनुमदीश्वर रखा।

रामेश्वर मंदिर की संरचना :
रामेश्वरम का मंदिर भारतीय वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। मंदिर एक हजार फुट लम्बा, छ: सौ पचास फुट चौड़ा है। चालीस-चालीस फुट ऊंचे दो पत्थरों पर चालीस फुट लंबे एक पत्थर को इतने सलीके से लगाया गया है कि दर्शक आश्चर्यचकित हो जाते हैं। विशाल पत्थरों से मंदिर का निर्माण किया गया है। माना जाता है कि ये पत्थर श्रीलंका से नावों पर लाये गये हैं। रामेश्वरम् और सेतु बहुत प्राचीन है। परंतु रामनाथ का मंदिर उतना पुराना नहीं है। दक्षिण के कुछ और मंदिर डेढ़-दो हजार साल पहले के बने है, जबकि रामनाथ के मंदिर को बने अभी कुल आठ सौ वर्ष से भी कम हुए है। इस मंदिर के बहुत से भाग पचास-साठ साल पहले के है। रामेश्वरम का गलियारा विश्व का सबसे लंबा गलियारा है। यह उत्तर-दक्षिण में 197 मीटर  एवं पूर्व-पश्चिम में 133 मीटर है। इसके परकोटे की चौड़ाई 6 मीटर तथ ऊंचाई 9 मीटर है। मंदिर के प्रवेशद्वार का गोपुरम 38.4 मीटर ऊंचा है। यह मंदिर लगभग 6 हेक्टेयर में बना हुआ है

मंदिर में विशालाक्षी जी के गर्भ-गृह के निकट ही नौ ज्योतिर्लिंग हैं, जो लंकापति विभीषण द्वारा स्थापित बताए जाते हैं। रामनाथ के मंदिर में जो ताम्रपट है, उनसे पता चलता है कि 1173  ईस्वी में श्रीलंका के राजा पराक्रम बाहु ने मूल लिंग वाले गर्भगृह का निर्माण करवाया था। उस मंदिर में अकेले शिवलिंग की स्थापना की गई थी। देवी की मूर्ति नहीं रखी गई थी, इस कारण वह नि:संगेश्वर का मंदिर कहलाया। यही मूल मंदिर आगे चलकर वर्तमान दशा को पहुंचा है।बाद में पंद्रहवीं शताब्दी में राजा उडैयान सेतुपति और निकटस्थ नागूर निवासी वैश्य ने 1450  में इसका 78 फीट ऊंचा गोपुरम निर्माण करवाया था। बाद में मदुरई के एक देवी-भक्त ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था। सोलहवीं शताब्दी में दक्षिणी भाग के द्वितीय परकोटे की दीवार का निर्माण तिरुमलय सेतुपति ने करवाया था। इनकी व इनके पुत्र की मूर्ति द्वार पर भी विराजमान है। इसी शताब्दी में मदुरई के राजा विश्वनाथ नायक के एक अधीनस्थ राजा उडैयन सेतुपति कट्टत्तेश्वर ने नंदी मण्डप आदि निर्माण करवाए। नंदी मण्डप 22 फीट लंबा, 12 फीट चौड़ा व 17 फीट ऊंचा है। रामनाथ के मंदिर के साथ सेतुमाधव का मंदिर आज से पांच सौ वर्ष पहले रामनाथपुरम् के राजा उडैयान सेतुपति और एक धनी वैश्य ने मिलकर बनवाया था। सत्रहवीं शताब्दी में दलवाय सेतुपति ने पूर्वी गोपुरम आरंभ किया। 18 वीं शताब्दी में रविविजय सेतुपति ने देवी-देवताओं के शयन-गृह व एक मंडप बनवाया। बाद में मुत्तु रामलिंग सेतुपति ने बाहरी परकोटे का निर्माण करवाया।

रामेश्वरम् का मंदिर भारतीय निर्माण-कला और शिल्पकला का एक सुंदर नमूना है। इसके प्रवेश-द्वार चालीस फीट ऊंचा है। प्राकार में और मंदिर के अंदर सैकड़ौ विशाल खंभें है, जो देखने में एक-जैसे लगते है ; परंतु पास जाकर जरा बारीकी से देखा जाय तो मालूम होगा कि हर खंभे पर बेल-बूटे की अलग-अलग कारीगरी है।रामनाथ की मूर्ति के चारों और परिक्रमा करने के लिए तीन गलियारे बने हुए है। इनमें तीसरा गलियारा सौ साल पहले पूरा हुआ। इस गलियारे की लंबाई चार सौ फुट से अधिक है। दोनों और पांच फुट ऊंचा और करीब आठ फुट चौड़ा चबूतरा बना हुआ है। चबूतरों के एक ओर पत्थर के बड़े-बड़े खंभो की लम्बी कतारे खड़ी है। प्राकार के एक सिरे पर खडे होकर देखने पर ऐसा लगता है मारो सैकड़ों तोरण-द्वार का स्वागत करने के लिए बनाए गये है। इन खंभों की पर अद्भुत कारीगरी है। यहां का गलियारा विश्व का सबसे लंबा गलियारा है।

24 कुओं का विशेष महत्व:
श्री रामेश्वरम में 24 कुएं है, जिन्हें 'तीर्थ' कहकर संबोधित किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इन कुओं के जल से स्नान करने पर व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है। यहां का जल मीठा होने से श्रद्धालु इसे पीते भी हैं। मंदिर-परिसर के भीतर के कुओं के सम्बन्ध में ऐसी मान्यता है कि ये कुएं भगवान श्रीराम ने अपने अमोघ बाणों के द्वारा तैयार किये थे। उन्होंने अनेक तीर्थो का जल मंगाकर उन कुओं में छोड़ा था, जिसके कारण उन कुओं को आज भी तीर्थ कहा जाता है।

अन्य तीर्थ स्थल : आप यहां के सेतु माधव, बाइस कुण्ड, विल्लीरणि तीर्थ एकांत राम, कोदण्ड स्वामी मंदिर, सीता कुण्ड जैसे धार्मिक स्थलों का दर्शन कर सकते हैं। वैसे रामेश्वरम केवल तीर्थस्थल ही नहीं है बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य की दृष्टि से भी दर्शनीय स्थल है। यहां देखने के लिए आपको और भी बहुत कुछ मिल जाएगा।

दर्शन समय : मंदिर में सुबह 5:00  से रात 9:00 बजे  तक दर्शन का समय होता है जिसमे दोपहर 1 से 3 बजे तक मंदिर बंद रहता है.
कैसे पहुंचें : रामेश्वरम से 154 किलोमीटर की दूरी पर मदुरई हवाई अड्डा है। आप यदि रेल के जरिए जाना चाहते हैं तो रामेश्वरम रेलवे स्टेशन देश के विभिन्न शहरों से पूरी तरह से जुड़ा हुआ है। अगर आप रामेश्वरम घूमना चाहते हैं तो यहां आपको यातायात की हर सुविधा उपलब्ध मिलेगी।
कहाँ ठहरे : रामेश्वरम में ठहरने के लिए मंदिर परिसर के आस पास गेस्ट हाउस, होटल और धर्मशाला बहुतायत में उपलब्ध है। यहाँ हर बजट के लिए लोगों के रहने के लिए कमरे उपलब्ध हैं। मंदिर समिति द्वारा भी ठहराने की सुविधा है जिसकी बुकिंग मंदिर समिति की वेबसाइट http://rameswaram.hrce.org.in/Rameswaram_Room_Booking/Room_Booking_Stage_1.aspx पर की जा सकती है।

अगली पोस्ट में आपको मदुरै के मीनाक्षी मंदिर लेकर चलेंगे, तब तक आप यहाँ की कुछ तस्वीरें देखिये ।
 मंदिर के अंदरूनी चित्र और टॉप व्यू रामेश्वरम से खरीदी बुक से लिए हैं । अन्दर कैमरा व मोबाइल ले जाना मना है   

इस यात्रा के पिछले भाग पढ़ने के लिए लिंक नीचे उपलब्ध हैं ।

                                 रामेश्वरम में सूर्योदय  



























पूर्वी द्वार 

उतरी द्वार 


पश्चिमी गोपुरम 


मंदिर गलियारा 

मंदिर -पश्चिमी और पूर्वी द्वार 


मंदिर -पश्चिमी और पूर्वी द्वार 

मंदिर में गलियारा 


मंदिर में गलियारा 


सागर पर बना रोड ब्रिज 

सागर पर बने पम्बन ब्रिज पर करते हुए  सागर का दृश्य 

सागर पर बने पम्बन ब्रिज पर करते हुए  सागर का दृश्य 

सागर पर बने पम्बन ब्रिज पर करते हुए  सागर का दृश्य 

सागर पर बने पम्बन ब्रिज पर करते हुए  सागर का दृश्य 

सागर पर बने पम्बन ब्रिज पर करते हुए  सागर का दृश्य 






28 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (01-06-2018) को "साला-साली शब्द" (चर्चा अंक-2988) (चर्चा अंक 2731) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. आभार शास्त्री जी .

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  2. अच्छी जानकारी। गलियारे की फोटो के लिए कैमरे की परमिशन है क्या।

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    1. धन्यवाद सर्वेश जी .गलियारे की फोटो के लिए कैमरे की परमिशन नहीं है.

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  3. गज्जब । फोटो तो कमाल के हैं ।

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    1. धन्यवाद हरेंदर भाई .

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  4. शानदार दर्शन, शानदार चित्रों से सुसज्जित मनभावन पोस्ट! यदि आप कुछ तथ्य (जैसे मंदिर का आकार, लंबाई,चौड़ाई और ऊंचाई व इतिहास आदि) देते हैं तो उनका स्रोत भी देने से आपकी पोस्ट का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।

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    1. धन्यवाद सर , आपकी सलाह अवश्य मानी जाएगी .

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  5. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, ३१ मई २०१८ - विश्व तम्बाकू निषेध दिवस - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. आभार मिश्रा जी .

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  6. Sangeeta BalodiJune 01, 2018 12:54 pm

    वाह मजा आ गया पढ़ कर,,,,,ओर साथ साथ खूबसूरत फोटोज देखकर.एक से बढ़कर एक फोटो

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    1. धन्यवाद दीदी .

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  7. ढेर सारी बेहद खूबसूरत तस्वीरों के साथ मंदिर के बारे में विस्तृत जानकारी . जय हो .

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    1. धन्यवाद संजीव जी .

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  8. बहुत बढ़िया जानकारी भरी पोस्ट तथा सूंदर तस्वीरें।

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    1. धन्यवाद चौधरी साहेब .

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  9. आपकी तरह ही मुझे भी समुंदर में नहाना ज्यादा पसंद नही है....बहुत भाग भाग के रामेश्वर से निकल रहे हो मदुरै के लिए.... रामेश्वर से मदुरै जाना वहां दर्शन करना और फिर रात को कन्याकुमारी के लिए ट्रेन पकड़ना बहुत हेक्टिक दिन होने वाला है आज आपका...मदुरै से रामेश्वरम दूर है थोड़ा करीब 4 घंटे

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    1. धन्यवाद प्रतीक भाई . हाँ थोड़ा हेक्टिक तो हो गया था लेकिन घुमक्कड़ी में ये तो चलता ही है .

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  10. जय हो रामेश्वरम तीर्थम में .... काफी दूर होने के कारण अभी तो दर्शन लाभ का सौभाग्य नही मिला पर आप की पोस्ट इस कमी को पूरा कर रही है रामेश्वरम वाकई में एक बहुत ही शानदार तीर्थ स्थल है आपकी पोस्ट बहुत अच्छे लगे चित्र में शानदार थे धन्यवाद पोस्ट शेयर करने के लिए

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    1. धन्यवाद रीतेश गुप्ता जी .

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  11. Marvelous post . Good description with lot of beautiful pictures.

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  12. सुंदर जगह और सुन्दर दर्शन !! उगते हुए सूर्य और मंदिर के गलियारे के फोटो तो बहुत ही सुन्दर हैं

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  13. धन्यवाद। योगी जी ।

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  14. सुन्दर तस्वीरों और जानकारी से भरी एक लगभग सम्पूर्ण पोस्ट .

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    1. धन्यवाद राज़ जी ।💐💐

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  15. सुन्दर दर्शन बेहद खूबसूरत तस्वीरों के साथ मंदिर के बारे में विस्तृत जानकारी

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    1. धन्यवाद संजय भास्कर जी .

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