यमुनोत्री – गंगोत्री
यात्रा ( Yamunotri - Gangotri Yatra )
पार्ट 1 : अम्बाला से बड़कोट
2011 में जब बद्रीनाथ धाम
और केदारनाथ
यात्रा का प्रोग्राम बना था तब यमुनोत्री और गंगोत्री जाने का विचार भी था
लेकिन यात्रा से कुछ दिन पहले भारी बारिश होने के कारण गंगोत्री जाने का मार्ग बंद
हो गया था। जब इन जगहों पर गाड़ी वाले ने जाने से मना कर दिया तो हमने इन दोनों जगह
को छोड़ अपने प्रोग्राम में हेमकुण्ड साहेब जोड़ लिया था । तीन साल बीत गए लेकिन इन
जगह पर जाना हो ही नही पाया । 2015 में यहाँ जाने का फ़िर से प्रोग्राम बनाया और
कुछ दोस्त भी साथ जाने के लिए तैयार हो गए । जैसे जैसे जाने का समय नज़दीक आता गया , एक-2 कर सभी ने
मना कर दिया । मुझे इसका कुछ आभास पहले से ही था इस लिए मैंने अपना प्लान-बी भी
तैयार रखा हुआ था । मैं गंगोत्री और यमुनोत्री जाने में और देर नही करना चाहता था
इसलिये अकेले ही जाने का निश्चय कर लिया और यात्रा के लिए जरुरी जानकारी लेनी शुरू
कर दी ।
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in between Nainbag to Barkot |
मालूम हुआ कि यमुनोत्री
जाने के लिए पहले बड़कोट जाना पड़ेगा । उत्तराखंड की चार धाम यात्रा यमुनोत्री से
ही शुरू होती है और इसका मुख्य पड़ाव बड़कोट ही है । आगे और खोज की तो मालूम
हुआ कि देहरादून से इसकी सीधी बस मिल जाती है और देहरादून से बड़कोट के दिन में सिर्फ दो बसें चलती हैं एक सुबह साढ़े
5 बजे और दूसरी दिन
में बारह बजे । जो बस यहाँ से सुबह चलती है वो ही दोपहर को बड़कोट से देहरादून
वापिस आ जाती है । दूसरी बस शाम को बड़कोट पहुंचती है और अगले दिन सुबह देहरादून
के लिए चलती है । सुबह वाली बस पकड़ना मेरे लिये सम्भव नही था इसलिए दोपहर 12 बजे
वाली बस में ऑनलाइन बुकिंग कर ली । चूँकि बड़कोट जाते हुए यमुना नदी और यमुना घाटी
बाएँ हाथ ही पड़नी थी इसलिए बस में बाएँ तरफ की विन्डो सीट बुक की थी ताकि बस से ही
सुन्दर दृश्यों को देख सकूँ और कैमरे में कैद कर सकूँ।
तय दिन सुबह 6 बजे घर से निकल
गया और ट्रैन से साढ़े आठ तक सहारनपुर पहुँच गया । रेलवे स्टेशन पर ही पहले घर से लाया हुआ नाश्ता किया और फ़िर
स्टेशन से बाहर आ गया । यहाँ का बस स्टैंड रेलवे स्टेशन के सामने ही है । यहाँ से
हरिद्वार और देहरादून के लिए दिन में बसें हर समय मिल जाती हैं । मुझे भी देहरादून
जाने के लिए एक बस तैयार मिली जो लगभग सुबह
9 बजे यहाँ से चल दी । देहरादून यहाँ से लगभग 70 किमी दूर है और मुझे उम्मीद थी की की 11 बजे से पहले आराम
से मैं देहरादून ISBT पहुँच जाऊँगा। देहरादून में दो बस स्टैंड हैं- पहला ISBT
जहाँ से अन्य राज्यों की बसें आती जाती हैं , दूसरा हिल बस स्टैंड जहाँ से उत्तराखंड
में हिल एरिया में जाने वाली बसें मिलती है । हिल बस स्टैंड शहर के बिलकुल मध्य व्यस्त
बाज़ार में बना हुआ है और ISBT से 6 या 7 किलोमीटर दूर है। यहीं से मुझे दोपहर 12
बजे बडकोट की बस लेनी थी।
शुरू में तो बस ठीक-ठाक
स्पीड से चल रही थी लेकिन जब दूरी कम रह गयी तो एक जगह जाम में फंस गए। देहरादून
की तरफ आखिरी कुछ किलोमीटर का रास्ता पहाड़ी है , यहीं एक मोड़ पर
एक लोडेड ट्रक मुड़ते हुए ख़राब हो गया । वो इस तरह खड़ा था की इसके साइड से एक समय
मे मुश्किल से एक ही गाड़ी धीरे-धीरे निकल सकती थी । इसके कारण काफी बड़ा जाम लग गया
। इसी रास्ते पर आगे काली माता का एक काफी
प्रसिद्ध मंदिर भी है । शनिवार होने के कारण यहाँ काफी भीड़ थी जिससे जाम की स्थिति
और भी बिगड़ गई थी। लगभग एक घंटे की मशक्कत के बाद हमारी बस इस जाम से निकल सकी ।
11 यहीं बज चुके थे और मुझे अब काफी चिंता होने लगी थी , डर था कहीं मेरी
बड़कोट वाली बस न छूट जाये । साढ़े 11 बजे बस देहरादून ISBT पहुंची । मैं
जल्दी से बस से उतरा और हिल बस स्टैंड जाने के बारे पूछताछ की । मालूम चलने पर रोड़
के दूसरी तरफ जाकर एक ऑटो ले लिया । इस दौरान 10 मिन्ट और बीत चुके थे ।
दोपहर का समय होने के कारण
सड़क पर काफी ट्रैफिक था इसलिए ऑटो रिक्शा भी धीरे ही चल रहा था । समय के साथ साथ मेरे दिल की धड़कनें भी बढ़ रही थी । मुझे
मालूम था यदि आज बस छूट गयी तो पूरा दिन खराब हो सकता है । मैंने ऑटो वाले को पैसे
पहुचने से पहले ही दे दिए थे ताकि उतरने के बाद पैसे
लेने-देने में समय बिलकुल भी खराब न हो। ठीक 12 बजे मुझे ऑटो ने
उतारा और बोला सड़क के दूसरी तरफ जाकर लगभग 100 मीटर अंदर दायीं
तरफ बसें मिलेंगी । मैंने सावधानी से सड़क पार की और बस स्टैंड की तरफ दौड़ लगा दी ।
चार बसें बाहर की तरफ मुंह करके जाने को तैयार खड़ी थी। सबके बोर्ड पढ़े ,कोई भी बड़कोट की
नही थी ,दोबारा चेक किया लेकिन रिजल्ट वही ढाक के तीन पात । मेरे
चेहरे पर हवाईयां उड़ने लगी । अभी 12 बजे से कुछ मिनट
ही ऊपर हुए थे और बस चली भी गयी । मेरा मूड काफी ख़राब हुआ- एक तो टिकट के पैसे भी
गए , दूसरा इसके बाद अब कोई सीधी बस नही थी। अब क्या करें? अंदर काउंटर पर
जाकर पता करने के लिए अंदर गया तो देखा एक बस काउंटर की तरफ मुँह करके खड़ी थी । कुछ
सवारी बैठी थी और कुछ सीटें खाली थी । आगे जाकर बोर्ड पढ़ा तो बड़कोट लिखा हुआ था ।
बड़ा सुखद आश्चर्य हुआ और Indian standard time पर फ़क्र भी हुआ। वैसे इस पूरे टूर
में मेरी बसों के साथ आँख मिचौली चलती रही । कभी मैं जीतता तो कभी हार जाता । जैसे
जैसे कहानी आगे बढ़ेगी किस्से आते रहेंगें।
बस के दरवाजे पर ही
कंडक्टर खड़ा था मैंने उसे अपनी ऑनलाइन बुकिंग की रसीद दिखायी , उसने बड़ी हैरानी से
देखा और रसीद लेकर अन्दर ऑफिस चला गया । वापिस आकर बोला ठीक है, आप अपनी सीट पर
बैठ जाओ। मैं बस में दाखिल हो गया और जैसे ही अपनी सीट के पास पहुँचा तो उस पर
एक 21-22 वर्ष की खूबसूरत लडकी बैठी हुई
थी। मैंने लड़की से सीट खाली करने को कहा ।
“Excuses me, you are sitting on my seat,
please come this side”
“ आपकी सीट कैसे ? मैं
पहले से इस पर बैठी हुई हूँ ! ” लड़की ने हिंदी में जबाब दिया ।
“ ये विंडो सीट मैंने पहले
ही ऑनलाइन बुक की हुई है !” मैं भी हिंदी पर आ गया ।
“ ऑनलाइन !!!! इसकी
ऑनलाइन बुकिंग भी होती है”
“ जी होती है । अब आप
please इस तरफ आ जाएँ”
“ अरे आपने बैठना ही है ,
आप इधर बैठ जाओ। विंडो सीट पर ही क्यूँ बैठना चाहते हो ”
“ मुझे जाते हुए रास्ते
में फोटोग्राफी करनी है”
“ वो तो इस सीट पर बैठ कर
भी हो जाएगी” लड़की मुस्कराते हुए बोली ।
“ पहाड़ी इलाकों में मुझे
उलटी भी हो जाती है ” मुझ पर उसकी मुस्कराहट का कोई असर नहीं हुआ ।
“ मुझे भी उलटी होती है
इसीलिए मैं विंडो सीट पर बैठी हूँ ,प्लीज मुझे यहीं
बैठने दो ”
लड़की सीट छोड़ने के बिलकुल
मूड में नहीं थी । आराम से वो मान नहीं रही थी , उससे सीट खाली करवाने का एक ही
तरीका था कि जोर-जोर से चिल्लाकर झगड़ा किया जाये ; लेकिन मैं ठहरा सीधा-साधा इंसान
, झगड़ा कैसे करता ? और यदि झगड़ा करके उसे विंडो सीट से उठा भी देता तो इस बात की
प्रबल सम्भावना थी की वो किसी और सीट पर ही जाकर बैठती और मेरे पास कोई दूसरी थकी-हारी
पकाऊ सवारी आकर बैठ जाती ।
“ आपने जाना कहाँ तक है ?”
उसकी प्रार्थना स्वीकार कर मैंने उसके साथ वाली सीट पर बैठते हुए पूछा ।
“ बड़कोट”
मुझे कभी ख़ुशी कभी गम
वाली फीलिंग आई । ख़ुशी इसलिए कि बडकोट तक बढ़िया खूबसूरत साथ मिलेगा और गम इसलिये कि
बडकोट तक विंडो सीट नहीं मिलेगी । लड़की ने सीट के लिए थैंक्यू बोला और फिर अपने
बैग से ईअर फ़ोन निकाल कर एक सिरा फ़ोन में लगाया और दूसरा दोमुंहा सिरा अपने कानो
में लगा कर म्यूजिक सुनने लगी ।
आजकल की जनरेशन के पास
ईअर फ़ोन जरूर मिलेंगे, उनके फोन में चाहे मिस कॉल मारने के लिए भी बैलेंस न हो, बेशक
20-20 रूपये का रिचार्ज करवाएं !!! लेकिन कहीं देख लो , घूमते फिरते ,शौपिंग करते
, टू व्हीलर चलाते ,सैर करते हुए भी ये ईअर फ़ोन तानसेन की कलयुगी औलादों के कान
में घुसे ही मिलते हैं ।
थोड़ी देर बाद लड़की ने
मुझसे पुछा कि इस बस में ऑनलाइन बुकिंग कैसे होती है। मैंने उसे वेबसाइट और सीट
बुक करने के प्रोसीजर के बारे में बताया। उसने बताया कि उसे अक्सर देहरादून और
बडकोट के बीच बस से ट्रेवल करना पड़ता है । ऑनलाइन बुकिंग से उसे आसानी रहेगी और वो
मनचाही सीट बुक कर सकेगी । मैंने जबाब दिया- कोई फायदा नहीं ! मैंने भी मनचाही सीट
बुक की थी, मिली क्या ? उसने मुस्कराकर टाल दिया । उसी से मालूम हुआ कि वो बडकोट
की रहने वाली है और देहरादून में यूनिवर्सिटी से MSC कर रही है । मैंने
उससे बडकोट से आगे जाने की जानकरी भी ले ली । उसने बताया की बडकोट से जानकी चट्टी
के लिए दिन में बस भी जाती है, शाम को बस तो नहीं मिलेगी लेकिन शेयर्ड जीप मिल
जाएगी।
थोड़ी देर की बातचीत के
बाद उसे तानसेन की आत्मा ने फिर झिझकोरा और वो फिर से ईअर फ़ोन लगा कर म्यूजिक
सुनने लगी । बीच-2 में उसके खास मित्र के फोन भी आ रहे थे लेकिन सानु की ??
हमने भी बैजू बावरा को मन ही मन याद किया
अपने सोनी एरिक्सन के ईअर फ़ोन निकाले और पंजाबी गाने सुनने लगे । दिलजीत दोसांझ चिल्ला
रहे थे !!
पखियाँ पखियाँ पखियाँ
, नी साडा बिल्लो दिल तोड़ के
तू कित्थे ला
लियां मोह्ब्बतां पक्कियां ........
बस मसूरी ,कैम्पटी फॉल
होते हुए यमुना पुल पर पहुँच गयी । इस जगह पर पौंटा साहिब , हेर्बटपुर और विकासनगर
से आने वाली सड़क इसमें मिल जाती है। यहाँ से बडकोट के लिए सिंगल लेन की पहाड़ी सड़क है।
यहाँ से थोडा आगे बढने के बाद एक जगह खाने
के लिए बस एक ढाबे पर रुकी। ढाबे के पीछे
नीचे गहरी घाटी मे यमुना बह रही थी। ठंडी-ठंडी हवा चलने से मौसम भी सुहावना हो
चूका था। खाने के विराम के यात्रा फिर शुरू हुई और बस नैनबाग , डामटा होते हुए शाम
6 बजे बडकोट पहुँच गयी ।
आज के लिए बस इतना ही । अगलीपोस्ट में आपको यमुनोत्री के दर्शन करवाते हैं । चूँकि आज की सारी यात्रा बसों में
ही थी तो ज्यादा फोटो नहीं है । कुछ फोटो आगे की पोस्ट से ...
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Campty fall- from other side road |
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Yamuna Pul |
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Yamuna @ yamuna pul |
Yamuna river |
Yamuna Valley |
view from Janki Chatti |
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Barkot |
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Barkot |
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Sunset @ Barkot |
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Barkot taxi stand |
"बड़ा सुखद आश्चर्य हुआ और Indian standard time पर फ़क्र भी हुआ" आपके यात्रा संस्मरण हमेशा मजेदार होते हैं, सहगल साहब। बहुत बढ़िया 😊
ReplyDeleteधन्यवाद ॐ भाई .बड़े दिनों बाद चक्कर लगाया .
Deleteबस का सफर और सहयात्री की बातचीत वर्णन अच्छा लगा।
ReplyDeleteधन्यवाद सचिन त्यागी जी .
DeleteVery well written post sir ji
ReplyDeleteThanks Mahesh jee. After so long time, finally.
Deleteआखिर एक पहाड़ी लड़की से सीट हार ही गए आप ।बाकी यात्रा वर्त्तान्त बहुत अच्छा लगा।
ReplyDeleteधन्यवाद रुपिंदर शर्मा जी . ब्लॉग पर आपका स्वागत है .
Deleteआखिर एक पहाड़ी लड़की से सीट हार ही गए आप ।बाकी यात्रा वर्त्तान्त बहुत अच्छा लगा।
ReplyDeleteबढिया वर्णित पोस्ट। अपनी व्यथा बताने के सुमधुर तरीके के लिए बधाई। सीधा- --सादा...वाली बात कुछ हजम नहीं हुई। 😇 । फोटोज भी अच्छी हैं।
ReplyDeleteधन्यवाद जी . हाजमोला खाया करो ,बातें हज़म हो जाएँगी :)
Deleteआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (31-08-2018) को "अंग्रेजी के निवाले" (चर्चा अंक-3080) पर भी होगी।
ReplyDelete--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
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बढ़िया वर्णन . वैसे लड़कियों से जीतने की जिद्द न कर आपने अच्छा किया .बढ़िया साथ ,बढ़िया यात्रा .अगली पोस्ट का इंतजार ..
ReplyDeleteधन्यवाद संजीव कुमार जी .अगली पोस्ट जल्दी ही
DeleteNice
ReplyDeleteधन्यवाद प्रफुल्ल जी .
Deleteबेहतरीन। हमेशा की तरह
ReplyDeleteधन्यवाद सौरभ गुप्ता जी .
DeleteIntrested post.
ReplyDeletethanks
Deleteक्या कहूं सहगल जी । सुन्दर..
ReplyDeleteधन्यवाद करुनाकर जी
Deleteशानदार जानदार बजनदार लेखन .
ReplyDeleteमजा आ गया .
धन्यवाद सुनील गुप्ता जी .ब्लॉग पर आपका स्वागत है
Deleteक्या बात है भाई जी �� .बहुत बढ़िया .
ReplyDeleteधन्यवाद मित्तल जी .
Deleteनयी यात्रा की शानदार शुरुआत खट्टी मिठ्ठी यादों और खूबसूरत तस्वीरों के साथ .
ReplyDeleteधन्यवाद राज साहब . स्वागत है
Deleteशानदार रोमांचक पोस्ट . जय हो .
ReplyDeleteधन्यवाद अजय जी .
Deleteजितना खूब सूरत नजारा है उतनी ही खूब सूरत यात्रा और लिखने की कला भी। धन्यवाद ..
ReplyDeleteधन्यवाद राजकुमारी ठाकुर जी.
Deleteइस बात की प्रबल सम्भावना थी की वो किसी और सीट पर ही जाकर बैठती और मेरे पास कोई दूसरी थकी-हारी पकाऊ सवारी आकर बैठ जाती । दोनों हाथ में लड्डू चाहते थे आप सहगल साब :) बढ़िया लिखा , रोचकता बनी रही पूरी पोस्ट में !!
ReplyDeleteहा हा हा ....दोनों हाथ में लड्डू सबको अच्छे लगते हैं !!! मेरी जगह आप होते तो आप भी ऐसा ही करते .
Deleteधन्यवाद योगी जी समय निकाल कर पढ़ने के लिए .
नरेश जी, यह पोस्ट पढ़ के दिमाग में कुछ सवाल उत्पन्न हुए है , कृपया उन सवालो का उत्तर दे,
ReplyDelete१. ऑनलाइन बुकिंग करवाने से फ़ायदा हैं (आपकी यात्रा के आधार पे)?
२. ज्यादा अच्छा क्या है, विंडो सीट से बहार के नज़ारे या विंडो सीट वाली का साथ?
बाकि पोस्ट तो काफी मज़ेदार हैं, वो भगा दौड़ी, बस ढूंढ़ना, बस मिलने की खुशी और राहत, लाजवाब हैं सब कुछ। अगले भाग का इंतज़ार हैं |
हा हा हा । अनित जी गणित साइंस तो चलती ही रहती है घुमक्कड़ी में । पोस्ट पसन्द करने के लिए धन्यवाद 💐💐.।
Deleteअगली पोस्ट अगले सप्ताह इसी दिन इसी चैनल पर 😊
सहगल साहब....ये पोस्ट तो शुरु होने से पहले ही खत्म हो गयी��
ReplyDeleteअरे अम्बाला से चलकर सहारनपुर देहरादून होते हुए बड़कोट पहुंच गया और तुम कह रहे तो खत्म हो गयी 😊😊. धन्यवाद अनिल भाई
DeleteThis comment has been removed by the author.
ReplyDeleteबढ़िया शुरुआत सहगल जी, उम्मीद है सहयात्री के साथ सफर अच्छा कटा होगा, वैसे इस तरह की घटनाओं से कई बार यात्रा का मजा किरकिरा हो जाता है ।
ReplyDeleteसही कहा प्रदीप भाई कई बार ऐसा हो जाता है लेकिन मेरी यात्रा बढ़िया रही ।समय निकाल कर पढ़ने के लिए धन्यवाद ।🙏💐💐
DeleteThank you so much for this information ….I liked your blog very much it is very interesting and I learned many things from this blog which is helping me a lot.
ReplyDeleteVisit our website: Escape to the vibrant Mexico City