Thursday, 18 January 2018

Uttrakhanad Yatra : Karn Paryag and Urgam Valley

भाग 3. कार्तिक स्वामी - कर्णप्रयाग - उर्गम घाटी :
यात्रा तिथि : 1 अक्टूबर 2017  
कार्तिक स्वामी से दर्शन के बाद जब हम कनकचौरी गांव पहुंचे तो दोपहर के 12 बजने वाले थे । हमें आने –जाने ,रुकने और फोटोग्राफी सब मिलाकर तीन घंटे लगे । सुबह जब यहाँ से चढ़ाई शुरू की थी तो मौसम में काफी ठंडक थी लेकिन इस समय यहाँ काफी तेज़ धूप थी। गाड़ी में आकर सब ने अपने स्वेटर – जैकेट उतार कर दोबारा से सारा सामान सेट किया और आगे की यात्रा जारी कर दी। यही सड़क आगे मोहनखाल - पोखरी होते हुए कर्णप्रयाग की ओर निकल जाती है । यदि हम रुद्रप्रयाग वापस आकर कर्णप्रयाग जाते तो हमें लगभग 40 किलोमीटर अधिक चलना पड़ता। यहाँ से पोखरी लगभग 15 किलोमीटर दूर है । पोखरी एक बड़ा क़स्बा है ,यहीं से एक सड़क गोपेश्वर की ओर भी जाती है। वहाँ एक तिराहा है जहाँ से बाएं हाथ वाली सड़क गोपेश्वर की तरफ़ और दायें हाथ वाली सड़क कर्णप्रयाग चली जाती है । इस तिराहे से हम कर्णप्रयाग की ओर  चल दिए । सारा रास्ता बेहद खूबसूरत और हरियाली से भरा हुआ है ।

कर्ण प्रयाग में अलकनंदा (बाएं) और पिंडर (दायें )का संगम 

Tuesday, 16 January 2018

Uttrakhanad Yatra - Kartik swami

उत्तराखण्ड यात्रा: कार्तिक स्वामी, कल्पेश्वर, रुद्रनाथ और कालीमठ
भाग -2 :कार्तिक स्वामी ( Kartik swami Temple)
पिछली पोस्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें ।
ब्यासी से आगे गाड़ी की ब्रेक से कुछ आवाज आने लगी । ब्रेक काम तो कर रहे थे लेकिन जैसे ही ब्रेक लगाते तो रगड़ की आवाज आती । पहाड़ी सफ़र में तो ब्रेक बिलकुल ठीक रहनी चाहिए इसलिए हम किसी कार मैकेनिक की दुकान देखते हुए चल रहे थे । देव प्रयाग में कोई दुकान नहीं मिली । आज दशहरा था तो कई दुकाने बंद भी थी । सावधानी से गाड़ी चलाते हुए हुए हम श्रीनगर पहुँच गए वहाँ एक कार मैकेनिक की दुकान मिल गयी । मैकेनिक ने जाँच करने के बाद बताया कि कार के ब्रेक शू घिस गए हैं ,बदलने होंगे । पास में ही एक स्पेयर पार्ट्स की दुकान थी ,उससे ब्रेक शू लेकर मैकेनिक ने जल्दी से बदल डाले । इस सारी प्रक्रिया में आधा घंटा लग गया । अब तक शाम के 6 बज चुके थे और हल्का अँधेरा शुरू हो चूका था। गौरव से बात हुई वो रुद्रप्रयाग पहुँचने वाला था । रुद्रप्रयाग से ही कनकचौरी के लिए सड़क अलग कट जाती है । कार्तिक स्वामी वाले इस मार्ग पर हम पहले कभी भी नहीं गए थे। गौरव को भी ये रास्ता नहीं मालूम था और वो रुद्रप्रयाग रूककर आगे का सफ़र हमारे साथ ही करना चाहता था 

                     कार्तिक स्वामी का यह चित्र -मेरे मित्र रविंदर भट्ट (रांसी वाले) के सौजन्य से 

Thursday, 11 January 2018

Uttrakhanad Yatra - Kartik swami, Kalpeshwar, Rudrnath and Kalimath

उत्तराखण्ड यात्रा: कार्तिक स्वामी, कल्पेश्वर, रुद्रनाथ और कालीमठ
पह्ला भाग :
पिछले वर्ष कल्पेश्वर -रुद्रनाथ जाने की बहुत इच्छा थी । दो अवसर भी आये लेकिन किसी न किसी कारण से दोनों बार नहीं जा सका । इसकी भरपाई पिछले साल नवम्बर में मद्महेश्वर जाकर हुई लेकिन दो अवसर गवाने के बाद इस साल रुद्रनाथ जाने की इच्छा और भी दृढ़ हो गयी थी । ऐसे तो उत्तराखण्ड  में आप साल के किसी भी महीने घुमक्कडी पर जा सकते हैं लेकिन मुझे ट्रेक के लिए सितम्बर –अक्टूबर का समय बेहद पसंद है । एक तो इस समय चार धाम के यात्रियों की संख्या काफी कम हो जाती है और भीड़ नहीं रहती , दूसरा मानसून लगभग ख़त्म हो जाने से भूस्खलन का खतरा भी काफी कम हो जाता है जिससे यात्रा में बाधा नहीं पड़ती । तीसरा कारण इन दिनों पहाड़ों पर हरियाली भी खूब होती है और खूबसूरत नज़ारे देखने को मिलते हैं ,नवम्बर शूरु होते ही ये घास पीली पड़ने लगती है।  
कार्तिक स्वामी

Tuesday, 24 October 2017

Dharamshala - Mcleodganj

धर्मशाला - मैक्लोडगंज 

बैजनाथ मंदिर में पुनः दर्शन के बाद हम लोग नाश्ते की तलाश में मार्किट की तरफ़ गए लेकिन अभी तक यहाँ की मार्किट नही खुली थी इसलिए यहाँ से बिना नाश्ता किये ही धर्मशाला की तरफ चल दिये । धर्मशाला के लिए हमें पालमपुर होते हुए चामुंडा देवी तक जाना था जहाँ से धर्मशाला का रास्ता अलग हो जाता है । यानि कल रात हम जिस रास्ते से आये थे उसी रास्ते से हमें चामुंडा देवी तक वापिस जाकर  , वहां से कांगड़ा जाने वाले मार्ग को छोड़ कर धर्मशाला जाने वाली सड़क पर जाना था । बैजनाथ से चामुंडा देवी की दूरी 22 किलोमीटर है और सारा रास्ता पहाड़ी ही है। इस पूरे रास्ते मे धौलाधार के शानदार नज़ारे देखने को मिलते हैं । मशहूर हिल स्टेशन पालमपुर लगभग मध्य में पड़ता है। पालमपुर अपने चाय के बागानों के लिए मशहूर है । पालमपुर में हम सबने एक चाय के बागान से हरी पत्तियों की चाय खरीदी ।

Thursday, 12 October 2017

Baijnath Temple -Himachal Pardesh

बैजनाथ मंदिर- हिमाचल प्रदेश
माँ चामुंडा देवी के दर्शन के बाद मंदिर परिसर से बाहर आकर पहले सबने चाय पी । सुबह नाश्ते के बाद से हमने अभी तक चाय नही पी थी इसलिए चाय की तलब भी हो हो रही थी । चाय पीने के बाद पार्किंग से गाड़ी निकाल कर बैजनाथ की ओर चल दिए । अब तक साढ़े पांच बज चुके थे औऱ हल्का अंधेरा होने लगा था । चामुंडा से बैजनाथ तक सारा रास्ता पहाड़ी ही है और  मशहूर हिल स्टेशन पालमपुर से होकर जाता है । पालमपुर अपने चाय के बागानों के लिए मशहूर है । इस पूरे रास्ते मे धौलाधार के शानदार नज़ारे देखने को मिलते हैं । अब चूँकि अंधेरा हो चुका था इसलिए इस समय हम बर्फ़ीली चोटियाँ नही देख पा रहे थे ।


Friday, 29 September 2017

Mata Chintpurni Temple

माता चिन्तपूर्णी मंदिर- छिन्नमस्तिका देवी (Mata Chintpurni Temple)

बगुलामुखी मंदिर में दर्शन के बाद हम सीधा माता चिंतपूर्णी के मंदिर की ओर चल दिये । माता चिंतपूर्णी का मंदिर यहाँ से लगभग 35 किलोमीटर दूर है ।यही रोड आगे मुबारकपुर ,अम्ब होते हुए ऊना  और नंगल की तरफ चली जाती है । बगुलामुखी से चिंतपूर्णी जाते हुए रास्ते में ब्यास नदी भी मिलती है लेकिन उस समय सर्दी होने के कारण ब्यास नदी में पानी काफी कम था । ब्यास नदी का पुल लगभग मध्य में पड़ता है यानि इस पुल से बगलामुखी और माता चिंतपूर्णी के मंदिर लगभग बराबर दुरी पर ही होंगे ।

मन्दिर का गर्भ गृह 

Tuesday, 26 September 2017

Mata Chamunda Devi

चामुंडा देवी मंदिर (Mata Chamunda Devi Temple)

बृजेश्वरी देवी, काँगड़ा में दर्शन के बाद हम चामुंडा देवी मंदिर की ओर चल दिए । काँगड़ा से चामुण्डा देवी का मंदिर लगभग 25 किलोमीटर दूर है । सड़क अच्छी बनी है ,ट्रैफिक भी कम था तो गाड़ी तेजी से भागी जा रही थी । काँगड़ा से आगे चलने पर धौलाधार पर्वत माला दिखनी शुरू हो गयी और इसकी बर्फ से ढकी ऊँची चोटियाँ काफी मनोरम दृश्य पैदा कर रही थी।, हरि भरी वादियाँ और कल कल बहते झरने हमें अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे । बीच में दो या तीन जगह पठानकोट –जोगिन्दर नगर रेल मार्ग की छोटी लाइन भी मिलती है । कुल मिला कर इस यात्रा मार्ग में अनेंक मनमोहक दृश्य हैं , पहाडी सौन्दर्य का लुफ्त उठाते हुए हमें समय का मालूम ही नहीं चला और हम चामुण्डा देवी पहुंच गए ।

Monday, 25 September 2017

Mata Brijeshwari Devi Temple-Kangra

माँ बृजेश्वरी देवी - नगरकोट वाली माता (Mata Brijeshwari Devi Temple)

ज्वाला जी में माता के दर्शन के बाद हमने बिना समय गवाएं, जल्दी से पार्किंग से गाड़ी निकाली और काँगड़ा की तरफ़ चल दिए जहाँ हमने बृजेश्वरी देवी यानि काँगडे वाली माता के दर्शन करने थे । काँगड़ा यहाँ से ज्यादा दूर नहीं है, मात्र 35 किलोमीटर ही है। काँगड़ा तक सड़क भी अच्छी बनी है इसलिए हम लगभग एक घंटे से भी कम समय में वहां पहुँच गए। मंदिर के आसपास कहीं पार्किंग नज़र नहीं आई तो एक सामने ही एक गली में गाड़ी साइड में लगा दी, मतलब पचास रूपये बचा लिये। मंदिर जाने के लिये गलियों से गुज़र कर जाना पड़ता है । मुख्य सड़क से मंदिर दिखायी भी नहीं देता सिर्फ़ एक छोटा सा गेट बना है और सारा रास्ता तंग गलियों से होकर है । मंदिर तक पहुंचना एक भूल भुलैया जैसा ही है ।


Saturday, 23 September 2017

Maan Jwala ji Temple

ज्वालामुखी देवी (Jwala Devi Temple )

नैना देवी मंदिर में दर्शन के बाद बाहर आकर पार्किंग की तरफ चल दिए और वहीँ एक भोजनालय में अमृतसर के मशहूर छोले कुलचे खाए और फिर चाय पीकर आगे के सफ़र के लिये निकल लिये । यहीं से एक सड़क सीधे भाखड़ा बांध होते हुए नंगल-उना की तरफ चली जाती है । जब यहाँ से चलने लगे तब  स्वर्ण ने कहा कि मुझे बाबा बालक नाथ के मंदिर जाना है वो इधर कहीं पास ही है , गूगल पर चेक किया तब मालूम हुआ की वो स्थान यहाँ से लगभग 100 किमी दूर है लेकिन जिस रास्ते से हमें जाना है उससे केवल 16 किमी हटकर है । हमने सर्वमत से सबसे पहले वहीँ चलने का फ़ैसला किया । वैसे तो इन दोनों स्थानों में एरियल दुरी 20 किमी ही होगी लेकिन बीच में गोविंग सागर झील पड़ने से इसके किनारे –किनारे घूम कर आने से बहुत दूर पड़ता है । यहाँ से हमने अपनी गाड़ी नंगल-उना वाली सड़क पर दौड़ा दी और भाखड़ा बांध के आगे से होते हुए उना-हमीरपुर रोड पर पहुँच गए । इसी मार्ग पर बडसर नमक जगह से बाबा बालक नाथ के मंदिर का रास्ता अलग हो जाता है। इस जगह से मंदिर 16 किमी दूर है। इस यात्रा का जिक्र कभी बाद में करेंगे आज सिर्फ़ ज्वाला माता के मंदिर ही चलते हैं ।

माँ ज्वाला जी मंदिर

Friday, 22 September 2017

Maa Naina Devi Temple

नैना देवी मंदिर Temple
हिमाचल में पाँच देवियों की यात्रा , एक काफी प्रसिद्ध यात्रा सर्किट है । माँ नैना देवी से शुरू होकर ,माँ चिंतपूर्णी ,माँ ज्वाला जी, कांगडे वाली माता (बृजेश्वरी देवी) और माता चामुण्डा देवी । बहुत से टूर ओपेरटर भी इन देवियों के एक साथ दर्शन के लिये बस द्वारा यात्रा आयोजित करते रहते हैं। अम्बाला से तीन दिन में इन सभी स्थानों पर जाकर वापिस आया जा सकता है।